लखनऊ में येशू के जन्मोत्सव को गुलज़ार बनाते अल्लाह के नेक बंदे

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खनऊ में हर प्रांत, हर जाती, पंथ और समुदाये के लोग रहते हैं. ऐसे शहर में जब भी कोई त्योहार आता है तो लाज़मी है की हर एक साथ मिलकर मनाते हैं. तो ज़ाहिर है की क्रिस्मस भी इससे अछूता नही रहेगा. लखनऊ में ईसाई धर्म के लोगों से कदम से कदम मिलाकर चलने वालों में से मुस्लिम भाई भी हैं.

तैय्यारियाँ घरों में तो होती ही हैं, साथ साथ केक बनने की प्रथा हफ्तों पहले शुरू हो जाता है. इसी बीच बेकरी पे लंबी कतारें अक्सर दिखती हैं. लकड़ी की पारंपरिक ओवेन में बनाई ये केक क्रिस्मस के मौसम में चार चाँद लगाती हैं.

सालों से चली रही इस प्रथा में कुछ नये परिवर्तन हुए, पर इस पुर त्योहार का मूल आकर्षण और उसको मनाने वाले आज भी इसको उसी चाओ से मनाते हैं जैसे पहले.

कुछ लखनऊ के बाशिंदों के लिए ये एक रीत बन गयी जिससे वो अपने आप को अलग नही कर पाए हैं. केक बनाए जाने की पुरानी परंपरा को आज भी ये ज़िंदा रखे हुए हैंये केक को साथ मिलके बनवाते हैं, जिससे वो त्योहार को मना भी सकें और दोस्तों से मिलके चार दिल की बात कर सकें.

लाल बाघ की बंगाल बेकरी पुराने ज़माने की आज भी कई यादें अपने आप में संजोए हुए है. ये उस समय से बेकरी की दुनिया में है जब नये केक विक्रेता मार्केट में नही थे. इसे चलाते हैं अरशाक़ अब्दुल, जो अपने दादा अहमद हूसेन, जिन्होंने इसे 1950 में शुरू किया उनकी रियासत को आगे बढ़ा रहे हैं. ये कई माइनों में ब्रिटिश परिवारों से सीखे इस कला की देन थी. जैसे जैसे इनका काम मशहूर हुआ अलग अलग रेसिपी प्रचलित हुआ

लखनऊ में ही चलने वाला रमज़ान अली बेकर्स, शुभम हॉल के बहुत करीब है जिसे 1966 में रमज़ान अली नाम के शक़स ने शुरू किया. अब इसे उनके नवासे, सफ़क अहमद चलाते हैं. एक ओर जहाँ वो अपने बिज़्नेस को चलाने में लोगों की सहायता लेते हैं पर क्रिस्मस के समय वो सह परिवार केक बनाना में जुट जाते हैं. आदि काल से चले रहे परिवारों की अब चौथी पीढ़ी अब इस दुकान में आती है. 14 से लेके 25 दिसंबर तक हर साल हर दिन क्रिस्मस के लिए खाद्य पकवान तैय्यार की जाती है.

माल एवन्यू रोड में भी एक 80 साल पुराना बेकरी आज भी केक बनाने में सक्रिय है जो ब्रिटिश साम्राज्य के टाइम से चल रहा है. उसे चलाते हैं शानू हासन. लखनऊ, लखीमपुर और सीतापुर के परिवार यहाँ पर हर साल आते हैं. साल के इस समय इसाई परिवार रात के चार बजे से अपना पसंदीदा केक लेने आते हैं. तकरीबन 25-30 परिवारों को केक डिलीवर करने में ये सब सक्षम हैं. हसन एक उदयगंज में महाराजा बेकर्स के नाम से बेकरी भी चलाते हैं.

सदर बाज़ार में ही कई नामी बेकरी हैं जिनमे से एक है बेकरी नो. 1 जिसे मुहम्मद कलीम चलाते हैं. लोगों से खचाखच भरा ये 100 साल पुराना बेकरी हर वक़्त केक्स की खुश्बू से गुलज़ार रहता है. ब्रिटिश के ब्राउन ब्रेड, सूप स्टिक्स और केक की माँग को पूरा करने के लिए भुलाई मिस्त्री को ये बेकरी दिया गया, बाद में मेहनत कर इसके मालिक ने अपना नया मकाम बनाया.

सारे बेकरीस में इस मौसम में केक बनाने के लिए लकड़ी के ओवेन सारा टाइम चलाते हैं जिससे लोग बढ़िया पारंपरिक केक का लुत्फ़ उठा सकें. दिन में लगभग 50 परिवारों का केक इन सभी बेकरी में बनता है.

कलीम और उनके भाई ना केवल अपना बेकरी चलाते हैं बल्कि ला मार्टिनीएर कॉलेज की बेकरी, धरम बेकरी, महाराजा बेकरी और अपोलो बेकरी की भी देख रेख करते हैं.

इसी से हम सब को सीख लेनी चाहिए मज़हब और जात के चश्मे से चीज़ों को देखने के बजाए एक दूजे को कदम से कदम मिलके चलना चाहिए.

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