लखनऊ में मुट्ठीभर सब्ज़ी वालों ने उठाया संस्कृत को बचाने का ज़िम्मा

संस्कृत जगत में बदलाओ का सपना देखने वाले ये सब्ज़ीवाले हर दिन इस प्राचीन भाषा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

संस्कृत को पढ़ना और पढ़ाना आजकल  कहीं गुम सा हो गया है. देश में अँग्रेज़ी और हिन्दी ही जब सही से ना बोल पायें तो संस्कृत का धूमिल होना तो लाज़मी है बताते हैं निशातगंज के सब्ज़ी वाले, जिन्होने संस्कृत  को प्रचलित करने का बीड़ा उठाया है.

निशातगंज सब्ज़ी बज़ार में 50 से 60 सब्ज़ी वाले अपना दुकान चलाते हैं. उनमे से तीन से पाँच दुकानदार ऐसे हैं जिन्होने देश में पहली बार एक ऐसा प्रयोग किया है जो सराहनीय है.

निशातगंज का सब्ज़ी बज़ार देश का पहला ऐसा सब्ज़ी बज़ार बन गया है जहाँ सब्ज़ी संस्कृत में बेची जा रही है.

बिकरीकर्ता और खरीददार हर दिन की तरह उस दिन भी अपना दिन यहाँ बिता रहे थे, जब मैं यहाँ स्टोरी करने गया. सब्ज़ीवालों के लिए अब खबरों में रहना आम बात है.

सब्ज़ीवाले बताते हैं की आठ से नौ मीडीया संस्थानों के पत्रकार आके उनसे अक्सर सवाल जवाब कर के गये हैं. उनका कहना है की उन्हे अच्छा लगता है खबरों में बने रहना लेकिन, संस्कृत की खुश्बू दूर तक फैलाना उनका मूल लक्ष्य है.

सन 60 से, अशोक और उनके कई साथी यहाँ पर अच्छा बिक्री कर रहे हैं. और लोग भी इनके पास बार बार आते हैं क्यूंकी अच्छी सब्ज़ी सही दाम पे उन्हें यहीं मिलती है.

कई वसंत यहाँ बिता चुके ये सब्ज़ी वाले हर दिन इसी उम्मीद से संस्कृत में बात करते हैं की संस्कृत को अपना पुराना सुनेहरा पहचान मिल सके और ज़माने के करवट लेते ही ये कहीं गुमनामी के कगार पे ना पहुँच जाए.

अशोक जैसे कई नौजवान संस्कृत को बढ़ावा देते हुए खुश हैं. उनके आँखों में एक अजीब चमक है इस प्राचीन भाषा को बोलते हुए. कई दुकानों में बोर्ड लगाया हुआ था, पर अब नही है क्यूंकी गर्मी में सब्ज़ी धोते वक़्त खराब हो जाते हैं. बज़ार में सब्ज़ी बेचते कुछ विक्रेता बताते हैं की एक शुक्ला जी थे जो आर्या कन्या विद्यालय से आए थे और उन्होने ही संस्कृत को बढ़ावा देने का ये अनूठा आइडिया दिया.

 वो कहते हैं की बाकी वहान के लोगों ने बीड़ा उठा या उस पर काम करने का.

अशोक और उनके जैसे कई लोगों के लिए मसला ये है की जब देश में लोग अँग्रेज़ी और हिन्दी ही नही बोल पाते हैं तो संस्कृत को कैसे बढ़ावा मिले.

निशातगंज में ही कार्यरत नंदू सोनकर कहते हैं, “हमारा काम है की हम संस्कृत को बढ़ावा दें. हम अगर असफल रहे तो हम क्या कर सकते हैं.”

लोग जो अक्सर यहाँ आते हैं खुश हैं की संस्कृत बोलचाल का ज़रिया है. कुछ खुश हैं, तो कुछ मानते हैं की अभी बहुत वक़्त लगेगा इस पर लोगों को रिझा पाना. पर लोगों में बोलने का ख़ासा उत्साह दिखा.

खबरों में ये जगह बना तो हुआ है, पर कुछ ऐसे भी हैं जो अभी भी इस सब से अछूते हैं. जहाँ कुछ लोगों ने पब्लिसिटी स्टंट कह के बात को झुटला दिया है, सिकंदर कुमार गुप्ता मानते हैं की हम मातृभाषा को पल पल मरते नही देख सकते है. जब कोई अच्छी संस्कृत बोलता तो हम भी उनको सब्ज़ी खरीद पे डिसकाउंट देते हैं..”

गुजरात के वीरू सोनकर और उनका परिवार जो अपना काम यहाँ पर कर रहे हैं कहते हैं, “जैसे उर्दू, अँग्रेज़ी और हिन्दी ज़रूरी है, वैसे ही संस्कृत भी जानना अनिवार्या है, एक भारतीय के लिए. हमारे इस मुहीम का मक़सद है की हम कुछ करें जिससे इंसान यहाँ से लौट कर घर पे दो शब्द संस्कृत के भी बोले. लोगों में उत्साह है, पर सीखने की चाह नही.”

निशातगंज सब्ज़ी बज़ार अकेले एक ऐसा बेज़ार है जहाँ संस्कृत को बढ़ावा मिल रहा है. यहाँ पर आलू को आलूकं, टमाटर को रखतपलम, करेला को कर्वेलह, गाजर को गूंजनक्कम, लहसुन को लशुनाम. प्याज़ को पलांदूह , आद्रक को आद्राकम और मिर्ची को मिर्चिकं कहा जाता है.

पर पूरी बात को संक्षिप्त में कहते हुए, एक सज्जन, सटीक बात करते हैं. वो कहते हैं अगर हम जैसे अनपढ़ लोग संस्कृत समझ सकते हैं, तो समाज का पढ़ा लिखा वर्ग क्यूँ नही? हम कभी बी किसी पे थोप्ते नही इस भाषा को.

देश में एक राष्ट्र भाषा पे बहेस तब छिड़ गयी जब NCST ने संस्कृत को राष्ट्र भाषा बनाने की गुहार लगाई थी.

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बेपनाह मोहब्बत के बादशाह राज कपूर भी कभी अकेलेपन के शिकार थे

सारी दुनिया पर राज करने वाला शोमेन जब नरगिस से बिच्छरा तो यून लगा मानो तन्हाई उसकी सहेली बन गयी हो| उसके टूटे दिल को कोई तब संभाल ना पाया……

हम लोग ऐसे समय में जीते हैं जब लिंक अप और ब्रेक अप  आम बात है, पर कुछ किस्से  ऐसे भी हैं बॉलीवुड में जो इन सब के बहुत ऊपर है| क्या ग़ज़ब संयोग है की राज कपूर  की पुण्यतिथि के एक दिन पहले ही नरगिस दत्त  की साल गिरह मनाई जाती है| और ऐसे में उनकी मोहब्बत का ज़िक्र ना हो तो कुछ अधूरा सा महसूस होता है|

हाल फिलहाल में RK स्टूडियोस के बंद होने के बाद काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है, पर बहुत कम ही लोग जानते हैं की राज और नरगिस की ही मोहब्बत पर आधारित था RK स्टूडियोस का लोगो जिसमे नरगिस और राज कपूर को पोज़ देते हुए देखा जा सकता है|

गौर से देखिए तो उस लोगो में राज के बिखरे बाल, सुडौल बदन और एक वाइयोलिन पकड़े नरगिस के साथ देखा जा सकता है| शायद ही कोई बॉलीवुड की प्रेम कहानी होगी जो इतनी प्रचलित हो| कपूर जो की इस साल 95 होते अगर वो जीवित होते, उन्होने एक बार कहा था की उनके बच्चों की मा उनकी पत्नी थी, परंतु उनके फिल्मों की मा नरगिस थी|

राज और नरगिस की पहली मुलाकात तब हुई जब नरगिस के आठ फिल्मों ने चार चाँद लगा दिया था, 1945 में, और राज नये नये कलाकार थे|

दोनो की जुगलबंदी जो 1948 के आग फिल्म से शुरू हुई वो श्रोताओं के सर चढ़ कर बोलने लगी और बरसात फिल्म आते आते हर एक के ज़ुबान पर था| नरगिस को राज इतने पसंद थे की उन्होनें मन ही मन राज को अपना हमदम मान लिया था|

 उन्होने समय, मन और धन सब उनके फिल्मों पर क़ुरबान कर दिया जिससे राज को फायेदा हो| जब पैसों का संकट RK स्टूडियोस पर आया तो उन्होने अपने सोने के कंगन बेच दिए| बहुत सारे चर्चित प्रोड्यूसर्स के साथ उन्होने उस दौर में इस लिए काम किया की कुछ धन राशि जुटा सकें|

राज, जिनके लिए माना जाता है की उन्होने मोहब्बत के बारीकियों को हिन्दी सिनिमा को सिखाया, उनके लिए नरगिस एक प्रेमी, अभिनेत्री, दोस्त और प्रोत्साहन के स्रोत के अलावा एक जीवन संगिनी थी| 

नरगिस का प्यार इतने ऊफान पे था की राज को नरगिस से फिल्मों में जुदा करना मुश्किल था|

इतनी शिद्दत से मोहब्बत के बाद जब, नरगिस ने सुनील दत्त से शादी करने का मॅन बनाया तो राज टूट चुके थे|

उनको इतना ज़ोर का धक्का लगा था की वो शराब पीने लगे गम भूलने के लिए और अक्सर रोते थे| नरगिस और राज की दूरी तब बढ़ने लगी जब उन्हे ये महसूस हुआ की उन्हे मन पसंद क़िरदार जीने को नही मिल रहे थे|

चाहे वो श्री 420 हो या फिर और फिल्में, एक ऐसी टीस दिल में नरगिस के घर कर गयी की उन्होने मदर इंडिया के लिए अपनी हाँहि भर दी. जब पिक्चर रिलीस हुई तो राज के लिए बुरी खबर आई की सुनील और नरगिस एक दूसरे के हो गये थे|

राज के लिए सुनील की ये सबसे बड़ी गद्दारी थी और इस सब के चलते राज कपूर के करियर पे गहरा असर पड़ा|

यहाँ तक की जब कॅन्सर पीड़ित नरगिस ने आखरी साँस ली तो राज आए पर दूर से ही आखरी अलविदा बोल के चले गये| उन्होने तब कहा था मेरे सब दोस्त चले जा रहे हैं| काले चश्मे के पीछे उस दिन की उदासीनता को बहुत कम ही लोग भाप पाए थे |

राज कपूर जिनको भारत का चार्ली चॅप्लिन भी कहा जाता था वो ना केवल आक्टर थे, उन्होने आचे फिल्मों की लंबी लड़ी लगा दी थी देश में. पेशावॉर में जन्मे राज  ने फिल्मों को हर पल जिया|

राज कपूर ने 1987 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार जीता. उन्हें 1971 में पद्मा भूषण से नवाज़ा गया|

फिल्मों के युगपुरुष और महानायक के रूप में आज भी राज कपूर को देखा जाता है|

उनके कलात्मकता की छाप आग, बरसात, श्री 420  और आवारा में बखूबी झलकती है|

भारत से लेकर रशिया तक “आवारा हूँ, या गर्दिश में हू आसमान का तारा हूँ,” “बरसात मैं हमसे मिले तुम साजन तुमसे मिले हम,” “मेरा जूता है जापानी, यह पतलून हिन्दुस्तानी,” “घर आया मेरा परदेसी,” “दम भर जो उधर मुँह फेरे ओ चंदा,” और “प्यार हुआ इकरार हुआ है प्यार से फिर क्यों डरता है दिल,” जैसे गाने आज भी हूमें उनकी याद दिलाती रहती है|

उनको सुरीला पहचान देने वाले मुकेश जब गुज़रे तब राज ने कहा था की आज मेरा आवाज़ चला गया|

राज की फिल्म संगम ने फिल्मों की दुनिया में नये कीर्तिमान स्थापित किए थे|

राज और राजेंद्र की फिल्मों को ख़ासा पसंद किया गया|

अच्छी सब्जेक्ट पे फिल्म बनाने वालों में से एक, राज ने गंगा पर आधारित राम तेरी गंगा मैली हो गयी बनाया तो लोग वाह वाही करते थक नही रहे थे|

हिना, मेरा नाम जोकर और काग़ज़ के फूल ने भी राज को ये दिखाने का मौका दिया की वो अपने समय के कलाकारों से बहुत आगे सोचते थे|

राज जिन्हे शोमन का खिताब मिला था उन्हे 3 राष्ट्रीय सम्मान, 11 फ़िल्मफेर पुरस्कार और उनके आवारा  को टाइम ने सर्वश्रेस्थ 10 अभिनायों में जगह  दी| विदेशी मूल के क्लार्क गेबल से उनकी तुलना कई बार की गयी है|

उनके करियर का सबसे पहला फिल्म था 1935 का इंक़लाब |

आखरी सफल फिल्म उनकी थी 1964 का संगम|

राज ने 1946 में आख़िरकार कृष्णा मल्होत्रा से शादी कर ली|

राज और कृष्णा के तीन बच्चे थे – रणधीर, ऋषि और राजीव. उनके दो बच्चियाँ थी ऋतु नंदा और रीमा जैन|

कहा जाता है की राज का व्यजयंतीमाला और दक्षिण भारत की पद्‍मिनी से भी प्रेम प्रसंग था|

उनके कई फिल्मों में देश प्रेम का भी संदेश था| आज के युग में जब बॉलीवुड में 250 से 350 फिल्में बनती हैं, एक और राज और नरगिस की ज़रूरत है जो कला और फिल्मों की पाकीज़गी को बरकरार रखे|

कॅन्सर की बाज़ी जीत के मानवता की सेवा करने वाले को मटका मॅन कहते हैं

कॅन्सर आदमी को अंदर से खोखला बना देता है. इंसान की रूह अक्सर काँप जाती है इस बीमारी से. बहुत ही कम लोग ज़िंदा बच पाते हैं इसके अभिशाप से. एक ऐसे युग में जब नामचीन सितारे अपने कॅन्सर से लड़ाई के बारे में ट्वीट करते थकते नहीं, तो एक ऐसे इंसान की कहानी जो लड़ा भी, विजयी भी हुआ और आख़िरकार अब वो समाज के लिए भला करने की भी ठान के जीवन जी रहे हैं.

हम बात कर रहे हैं दिल्ली के अलगरतनाम नटराजन की, जो की मिट्टी के मटके में पानी भरके प्यासे को पानी पिलाते हैं, तपती गर्मी में.  कहते हैं प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम होता है, ऐसे में दिल्ली वासियों के लिए मटका मॅन किसी भगवान से कम नही हैं.

चाहे मुनिसिपल कर्मचारी हो, रिक्कशे चालक हो, सड़क पर बैठे विक्रेता हो या फिर जमादार हो. हर एक की हाज़री, मटका मॅन के दरबार में एक बार तो होती ही है. शहर के नाना हिस्सों में मटके रखे गये हैं जहाँ से प्यासे अपनी प्यास बुझाते हैं.

शहर के 80 मटकों में हर दिन मटका मॅन पानी भर देते हैं..

70 साल की उमर वेल मटका मॅन हर सुबह भोर पार उठते हैं और अपनी गाड़ी में करके हर मटके में पानी भर के आते हाँ जहाँ लोग पानी की तलाश में आते हैं.

ग़रीबों को पानी पिलाने का बीड़ा उठाना सराहनिय भी है और चुनौतीपूर्णा भी. क्रांति की एक अलग अलख जगाने वाले अलगरतनाम 2014 से इस तरह से मानवता की सेवा कर रहे हैं.

शुरुआत उन्होने अपने घर के बाहर एक वॉटर कूलर लगाने से की.

कभी ऑक्स्फर्ड स्ट्रीट लंडन में अपना डेरा जमाने वाले आज वो भारत की राजधानी दिल्ली में रहते हैं.

जब नटराजन ने शुरुआत की तो लोगों ने उन्हे दिल्ली सरकार का कर्मचारी समझा पर अब लोगों की धारणा बदली है.

पानी बाँटने वाले मटका मॅन आज कल फल और अन्य खाने के चीज़ें भी बाँटते हैं.

नटराजन ने अपने ज़िंदगी के 40 साल लंडन में बिताए हैं.

इंटेस्टाइनल कॅन्सर से ग्रसित वो देश वापस आए.

उन्होने लावारिस लोगों की देख भाल भी की, लंगर का वितरण किया चाँदनी चॉक में और कई लोगों का क्रियाकर्म भी किया.

उनकी गाड़ी एक Van है जिसमे 800 लीटर का टांक फिट किया गया है जिससे वो पानी ढो पाते हैं.

महीने में मटकों में तकरीबन 2000 लीटर पानी  आता है गर्मियों के महीने में.

मटकों के अलावा उनके 100 साइकल पंप भी हैं, जिसका लाभ लोग उठाते हैं.

जब उन्होने शुरुआत की तो लोगो ने विरोध भी किया पर अब सब ठीक चल रहा है.

कॅन्सर से मुक्ति मिल गयी नटराजन को क्यूंकी शुरुआती चरणों में ही उसका इलाज करवा लिया गया.

अच्छे कार्यों के शौकीन, नटराजन  ने छोटी से चीज़ जैसे सब्ज़ी बेचना और फल बेचने से परहेज़ नही किया.

अपनी जमा पूंजी को खर्च करने वाले, मटका मॅन, आज कई नौजवानों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं. उनके जज़्बे को देखते हुए लोगों ने उनका हाथ बटाना भी शुरू कर दिया है. जिस युग में आदमी आदमी को नीचे गिराने में और सेवा भाओ से कोई काम करने में दो बार सोचता है, ऐसे समय में मटका मॅन कलयुग के पवन पुत्र या विज्ना हरता से कम नही. ऐसे लोगों से उम्मीद जागती है की आदमी चाहे तो मानवता की सेवा निस्वार्थ भाओ से कर सकता है फिर चाहे कितने अर्चने आयें.

यादों के झरोखों से: मल्हौर की बातें एमिटी वासी ही जाने

Newly inaugurated Malhaur flyover

राजेश खन्ना ने कभी कहा था – वो भी एक दौर था और ये भी एक दौर है. अपने ज़माने का सुपरहित डाइलॉग था. आज वोही बात दोबारा याद आ गयी जब मल्हौर फ्लाइ ओवर का चित्र दोस्त के FB स्टेटस पर देखा.

जब से एमिटी, मल्हौर गया, सब लोगों ने मेरी तरह मल्हौर क्रॉसिंग को पानी पी पी के कोसा था. गाड़ी की लंबी कतारें, लंबे समय तक ट्रेन का ना आना, धूप, बारिश और सर्दी के दिनों में टकटकी लगा का एक दूसरे को देखना और इसी बीच स्कूटर और गाड़ियों पे बैठे सवारियों की अपने बीच की पंचायत.

कोई खड़े खड़े व्हाट्सएप स्टेटस टटोलता, कोई जल्दी से एक फ़ेसबुक या ट्विटर स्टेटस शेर करता. और लड़कियों को पाउट वाली सेल्फिे लेने का अच्छा मौका मिलता. एक ऐसे समय जब हर सेकेंड कीमती  होता है, इस दिनचर्या के हिस्से ने हम सबको धीरज धरने की कला से भी बखूबी अवगत कराया.

सरकारें आईं और गयीं, बॅचस आए गये पर लाइफ इन मल्हौर कभी ना बदला, क्यूंकी वो कहते हैं ना, समय से पहले और मुक़द्दर में जो लिखा होता है उससे ज़्यादा कभी कुछ नही मिलता है.

कभी चाय पीना या जलेबी और डालमोट का चखना जिस गलियारे में सुहाना लगता था, आज उसी महफ़िल में शायद हम और आप  ना होंगे, क्यूंकी अब ऊँची उड़ान भरने के लिए मल्हौर फ्लाइ ओवर आतुर है.

अब कैसे कहेंगे अपने टीचर्स से मॅम क्रॉसिंग बंद था तो लेट हो गये – अटेंडेन्स दे दीजिए प्लीज़, ना ही एमिटी ना आने के बहाने दे पाएँगे हम और आप, क़यास ये भी लगाया जा रहा है की अब जिनके गाड़ी घोड़े क्रॉसिंग के पार से घूम के चले जाते थे, अब हँसी खुशी 40 एकर के एमिटी विश्वविद्यालय के साथ अपना नया रिश्ता जोड़ेंगे.

मल्हौर की 10 साल की कहानियाँ आज के युग में कई विद्यार्थी बयाँ करते नही थकते, कॉलेज के कई इवेंट में अक्सर एक छोटी झलक मल्हौर और उसके इर्द गिर्द घूमते ज़िंदगी की भी है. हर बाशिंदा एमिटी का कभी ना कभी इस क्रॉसिंग से गुज़रा ज़रूर है, पर आज जब फ्लाइ ओवर बन गया तो ब्रिड्ज के साइड्स पे पतली सड़कों पर संतुलित ढंग से गाड़ी चलाना आदमी को बॅलेन्स और कंट्रोल की सही परिभाषा सिखा गयी.

क्या पता हम तेरी गलियों में फिर कभी ढाबा बोलें या नही, ये तो पता नही पर मल्हौर एक जीवन का अभिन्न अंग था, है और रहेगा. क्यूंकी मंदिर रूपी एमिटी में जाने के लिए थोड़ा परिश्रम और कष्ट तो बनता है बॉस.

अगर WH डेवीस की कविता लेशर की कुछ लाइन्स अपनी तरह लिखूं तो ये कहना ग़लत नही होगा की –

What is this life, if full of care

No time to stand and stare

No time to stand where woods we pass

Where squirrels hide their nuts in grass

No time to stand beneath the clouds in Malhaur

And stare at passing trains as long as sheep or cows  

कभी सचिन की वाह वाही किए बिना ही गुरु रमाकांत आचरेकर ने उन्हे बना दिया क्रिकेट का भगवान

एक अच्छे बल्लेबाज़ होने के साथ साथ सचिन रमेश तेंदुलकर को कई उपाधियों से नवाज़ा जा चुका है. उन्हे मास्टर ब्लास्टर और लिट्ल मास्टर जैसे नामों से अक्सर पुकारा जाता है. पर उन्हें भी एक बात का मलाल ज़िंदगी भर रहेगा.

उन्हे देश विदेश में ख्याति प्राप्त हुई और प्यार मिला पर उनके गुरु द्रोण रमाकांत आचरेकर ने उन्हें कभी भी बहुत खूब नही कहा ,जब वो अच्छी क्रिकेट की खुश्बू मैदान पर बिखेरते.

 सचिन और उनके कोच, रमाकांत की जोड़ी को लोग द्रोणाचर्या और अर्जुन, या रामकृष्ण परमहांसा और स्वामी विवेकानंदा के रूप में देखते हैं.

रमाकांत आचरेकर जिन्होने कुछ ही दिन पहले अंतिम साँस ली, कभी सचिन को शाबाशी नही दिए. शायद इसी लिए की वो कामयाब बनें और एक दिन दुनिया में जलवा बिखेरें.

जब सचिन तेंदुलकर को भारत रत्ना मिला तो उन्होनें आख़िरकार सचिन को वेल डन कह ही दिया.

आज रमाकांत सर हुमारे बीच नही हैं पर उनके कई बहुमूल्य अर्जुन आज क्रिकेट को नयी उँचाइयों पे ले जा रहे हैं. 

आचरेकर को द्रोणाचर्या सम्मान से 1990 में नवाज़ा गया. कुछ वर्ष पूर्व उन्हें पद्मा श्री मिला 2010 में.  उन्हें क्रिकेट के शीर्ष कोच के तौर पर देखा जाता है.

तेंदुलकर हमेशा आचरेकर के साथ रहे. आचरेकर की आखरी यात्रा में तेंदुलकर के अलावा उनके साथ विनोद कॅंब्ली, बलविंदर सिंग संधु, चंद्रकांत पंडित,  अतुल रानाडे, अमोल मज़ूंदार, रमेश पोवार, पारस म्म्बरे, मुंबई रणजी कोच विनायक सामंत, नीलेश कुलकर्णी और विनोद राघवन बने रहे.

तेंदुलकर को रमाकांत आचरेकर का सबसे काबिल स्टूडेंट माना जाता है. तेंदुलकर ने अपने करियर में 34,357 अंतरराष्ट्रिया रन्स बनाए, सौ अंतर राष्ट्रिया शतक बनाए और 201 अंतर राष्ट्रिया विकेट लिए.

सचिन ने अपने ऑटोबाइयोग्रफी प्लेयिंग इट माइ वे में रमाकांत आचरेकर का ख़ासा ज़िकर किया है.

सचिन की मानें तो 11 – 12 साल की उमर में जब भी उन्हें मौका मिलता वो रमाकांत
सर के स्कूटर पे बैठते और प्रॅक्टीस मॅच खेलने चले जाते. कभी वो आज़ाद मैदान में खेलते. कभी शिवाजी पार्क में और ये कारवाँ बढ़ता जाता. ये रमाकांत आचरेकर की ही देन  थी की मुंबई के कई हिस्सों में छोटे बड़े मंचों पर सचिन को एक अच्छा खिलाड़ी माना जाने लगा.

माना जाता है की अगर आचरेकर के कहने पर सचिन का परिवार शारदाशरम विद्या मंदिर नही आते तो शायद दुनिया को ये अद्भुत नगीना नही मिलता.

आचरेकर ने भी कभी ये नही सोचा था की सचिन कभी इतना ख्याति पूर्ण क्रिकेटर बनेंगे.

आचरेकर के बारे में ये भी कहा जाता है की वो छुप के अपने स्टूडेंट्स को देखते और फिर उन्हें अपनी ट्रूटियाँ बताते.

गुरु के देहांत के बाद, सचिन ने एक भाव भीनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा – “वेल प्लेड, सर, आशा करता हूँ आप जहाँ भी हों अपने क्रिकेट के ज्ञान को बखूबी फैलाते रहेंगे.

ऐसे समय में जब देश में क्रिकेट को एक धर्म की तरह देखा जाता है तो आचरेकर का जाना क्रिकेट जगत के लिए एक अपूरणिया क्षति है. उनके करोड़ो चाहने वाले उनके गौरवपूर्ण इतिहास को हमेशा याद रखेंगे.

आतंक के बदनाम गलियों को छोड़ वाणी ने देश के लिए जीवन त्याग दिया

Wani

बड़ी अजीब बात है. एक ऐसे दौर में जब हम आतंकवाद को जड़ से ख़तम करने की बात कर रहे हैं, तो वंही एक ऐसा कहानी सामने आता है, जो बताता है की मौका मिले तो आतंकी भी वतन के लिए लड़ सकता है. हर बार ज़रूरी नही की वो निर्दोष और निहत्तों को ही मार गिराए. अपने देश की साख बचाने के लिए भी वो अपना लहू बहा सकता है.

कुछ ऐसी ही कहानी है लॅन्स नायक नज़ीर अहमद वाणी की. देश के लिए लड़ते हुए शहीद होने वाले वाणी कभी आतंक फैलाने के कारोबार का हिस्सा थे. पर जब उन्होने उस रास्ते तो त्यागने की ठानी तो उन्होने भी मन बनाया की वो देश के लिए कुछ करेंगे.

दिवंगत वाणी के पिता को एक सेना का जवान गले लगाता हुआ एक तस्वीर पे दिखाई पड़ता है. ज़ाहिर तौर पे फोटो काफ़ी वायरल हुई है. इस नज़ारे को देखते हुए कईओं की आँखें भी नम हो गयी. सेना ने अपने ट्विटर हॅंडल पर वाणी के पिता और एक सिपाही की गले लगते तस्वीर दिखाई और ये भी लिखा की आप अकेले नही.

वाणी वीरगति को प्राप्त तब हुए जब वो सेना की एक टुकड़ी के साथ ऑपरेशन पे थे शोपियन में. वाणी को लड़ाई में बहुत बुरी तरह चोट लगी और उन्हें श्रीनगर के 92 बेस हॉस्पिटल ले जाया गया जहाँ उन्होने दम तोड़ दी.

नज़ीर अहमद वाणी ने ना केवल छे आतंकियों को मारने में मदद की बल्कि खुद भी अपनी जान गवा दी. उन्हे दो बार सेना मेडल से सम्मानित किया जा चुका है. एक बार 2007 में और एक बार स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पूर्व.

कुलगाम में रहने वाले, अहमद, टेरिटोरियल आर्मी के साथ थे पर आखरी बार वो 34 राष्ट्रीय राइफल्स के साथ थे रविवार को. 38 साल के वाणी 2004 में टेरिटोरियल सेना के 162 बटॅलियन से जुड़े. उससे पहले वो एक इखवान थे. सेना में कार्यरत वाणी को बहुत इज़्ज़त और गर्व से देखा जाता था.

तिरंगे में लिपटे वाणी का पार्थिव शरीर पहले कुलगाम पहुँचा उनके घर और फिर पूरे रीति रिवाज़ के साथ अपने आखरी गंतव्य के लिए रवाना हो गया. ये जगह खबरों में अक्सर बना रहता है. गाँव चारों ओर से कोइन्मूह जैसे जगहों से घिरा हुआ है जो अपने आतंकी वारदातों की वजह से सुर्खियाँ बटोरते हैं.

वाणी के जनाज़े के दौरान चक असमूजी गाँव के सभी लोगों की आँखें नम हो गयी.

सेना ने एक भावभीनी श्रद्धांजलि दी उन्हें बादामी बाघ कांटोनमेंट के 15 कोर हेडक्वॉर्टर्स में.

उन्हें कब्रिस्तान में बाइज़्ज़त दफ़नाया गया 500 से 600 गाँव वालों के बीच. उन्हें एक 21-बंदूकों की सलामी भी दी गयी.

उनको जानने वाले उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें हमेशा याद रखेंगे ऐसा उनको जानने वाले मीडीया से बात करते हुए बताते हैं. वाणी की पत्नी और दो बच्चे हैं जो उनके जाने की शोक में हैं.

तो जिन्होने हिंसा को गले लगाया है उनके पास अब भी समय है सुधरने के लिए. वो चाहें तो अपने देश प्रेम के जज़्बे तो तराश सखते हैं.

तो सियावर रामचंद्र हों, या फिर लंकापति रावण, जानिए उनका जीवन इस सफ़र पर

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Pic courtesy – DD

देश में राम का नाम बड़ी ज़ोरो शॉरों से लिया जा रहा है और ऐसा हो भी क्यूँ ना क्यूंकी राम हम सब के लिए गौरव के प्रतीक हैं. इसी बीच एक ऐसे रामायण सर्किट की शुरुआत हुई है जो की आपको सीधे राम के जीवन का पूर्ण दर्शन कराएगी और आपको लंका पति रावण के द्वार तक पहुँचने का भी मौका देगी.

मंदिर, मूर्ति और राम भक्तों के जयघोष के बीच अब राम भक्ति ने देश में एक नया आयाम ले लिया है. हाल्ही में दिल्ली के सफ़दरजंग स्टेशन पर माथे पर हल्दी-रोली तिलक लगाए, गले में मालायें डालकर, लोग मंत्र उच्चारण करते दिखाई दिए. मंत्रोच्चारण के बीच एक राम भक्तों की टोली एक सोलह दिन के सफ़र के लिए रवाना हो गयी.

बताया जा रहा है की रामायण सर्किट के अंतर्गत प्रभु श्री राम से जुड़े वो सारे जगहों पर लोगों को ले जाया जाएगा जिसका विवरण रामायण में किया गया है.

बताते चलें की ये टूर पॅकेज खाना, रहना और बाकी के ज़रूरतों को बखूबी ज़ेहन में रखती है. एक IRCTC टूर  मॅनेजर लोगों के साथ सफ़र करेंगे.

दिल्ली से चलने के उपरांत ये ट्रेन अयोध्या, हनुमान गरही, रामकोट और कनक भवन टेंपल जाएगी. ये नंदीग्राम, सीतामढ़ी, जनकपुर, वाराणसी, प्रयाग, शृंगवेरपुर, चित्रकूट, नासिक, हम्पी और रामेश्वरम का भी सफ़र तए करेगी.

बताया जा रहा है की रामायण एक्सप्रेस में 800 लोग एक बार में सफ़र कर सकते हैं. प्रति यात्री भारत दर्शन का दर 15,120 रुपये रखा गया है. अगर आपको लंका जाना हो तो उसका पॅकेज अलग है.

लंका जाने वालों के लिए हवाई जहाज़ पर जाने की सुविधा उपलब्ध है. यात्रा में इच्छुक लोग चेन्नई से कोलंबो जा सकते हैं.

कहा जा रहा है की ये भारत में तो घुमाएगा ही साथ ही में श्री लंका के चार स्थानों पर भी राम भक्तों को ले जाएगा.

पाँच रात और छे दिन का पॅकेज IRCTC प्रति यात्री 36,970 रुपये में दे रहा है.

श्री लंका का दौरा आपको कॅंडी, नुवारा एलिया, कोलंबो और नेगोम्बो ले के जाएगा.

बताते चलें की IRCTC अभी बुद्धा सर्किट पर कुछ रेलगाड़ियाँ चला रहा है और अधिकतर राजस्व उत्पत्ति के लिए रामायण सर्किट को पुरज़ोर महत्व दिया जा रहा है.  खबरें ये भी आ रही हैं की IRCTC ने रेलवे बोर्ड से कहा है की तीन और ट्रेन खरीदी जायें जिससे रामायण सर्किट को बढ़िया तरह से चलाया जा सके. जिससे बाकी यात्रियों के आवागमन के लिए ट्रेन्स बाधित ना हों.

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विष्णु के सातवे अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम राम को रामचंद्र के नाम से भी जाना जाता है जिन्होने त्रेता युग में अवतार लिया था. उनके भाई थे लक्ष्मन, भरत, और शत्रुघ्न.

राम अयोध्या में कौशल्या और दशरथ के घर जन्में थे. उनका विवाह सीता से हुआ था.

रामायण को एक ऐसा ग्रंथ माना जाता है जिससे इंसान को अपने ज़िंदगी के बारे में गहरा मार्ग दर्शन मिलता हैं जिसको प्रभु राम के ज़िंदगी के द्वारा चरितार्थ किया गया है.

बैरहाल राम की नगरी में दीवाली और दशहरा की धूम और रामायण एक्सप्रेस से लगता है राम हम सब के बीच में ही हैं.

एक ऐसी शाही प्रेम कथा जिसने लिख दी करवा चौथ की इबारत

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आपने अक्सर लोगों को ताना मारते सुना होगा की बड़ी सती सावित्री बनती है, कभी आपने सोचा की क्यूँ सावित्री को एक आदर्श नारी माना जाता है और हर साल करवा चौथ लोग मनाते हैं. चलिए जानते हैं.

सावित्री मद्रा देस के राजा अस्वपति की बेटी थी. जब उनकी शादी करने की उम्र हुई तो उन्होने सत्यवान से शादी करने की ठानी. राजा ड्यूमतसेन के बेटे राजकुमार सत्यवान घर और साम्राज्य से तबसे दूर रहने लगे जब उनके पिता से शाही रियासत छिन गयी. वो जंगल में अपने अंधे पिता और माँ के साथ रहते थे.

नारद मुनि जिनकी पहुँच दूर दूर तक थी और जिनके पास बहुत सारी जानकारी रहती थी उन्हे बात पता चला तो उन्होने सावित्री के पिता को बताया की शादी के पूर्व सत्यवान की जान चली जाएगी. ज़ाहिर तौर पर परिवार चिंतित हो उठा उन्होने सावित्री को समझना भी चाहा परंतु वो अपने निर्णय पर अडिग थी. उसने सत्यवान से ही शादी रचाया और दोनो जंगल की ओर चले गये.

क्यूंकी सावित्री को जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होगी उसका अंदाज़ा था उसने उससे तीन दिन पहले अन्न जल त्याग तपस्या शुरू की. नियती के मुताबिक सत्यवान लकड़ी काटने गये और कुछ देर बाद गिर पड़े. सत्यवान उस दिन मर गये पर सावित्री ने यमराज का पीछा किया.

यमराज ने प्रसन्न हो उसे एक वर माँगने को कहा. उसने अपने पति के माता पिता की ज्योति वापस माँगी. यमराज मान गये और फिर उसने उसी प्रकार पीछा करने के बाद एक और वर माँगा की उसके ससुर और 100 भाइयों का साम्राज्य उन्हे वापस मिल जाए. यमराज ने ये भी मान लिया. फिर क्या था ऐसे कर कर के सावित्री ने सौ पुत्रों का वर माँगा और आखरी में अपने पति सत्यवान को जीवन दान दिला दिया ये कहके की बिना पति हमारा परिवार फलेगा फूलेगा कैसे. यहाँ पर यमराज को भी झुकना पड़ा.

सावित्री अब वापस पहुँची उसी वट वृक्ष के पास जहाँ उनके पति का शरीर था. उन्होने एक परिक्रमा किया और देखा की उनके पति ने आँखें खोली.

सावित्री और सत्यवान दोनो घर लौटे. सारे वरदान सच हो गये और तबसे अमर हो गयी सावित्री सत्यवान की कहानी.

तबसे लेके आज तक हर पतिव्रता नारी करवा चौथ या वट सावित्री का व्रत करती हैं और बरगद के पेड़ को पूजती हैं. कार्तिक मास के कृष्णा पक्षा चतुर्थी को हर पतिव्रता स्त्री अपने पति के चिरायू होने की कामना करती है. करवा चौथ और संकश्ती चतुर्थी एक ही दिन पढ़ता है.

प्रमुखतः करवा चौथ पँजाब, हरयाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है. इसको सूर्योदय और रात के बीच मनाया जाता है.

जैसे जैसे समय बीतता गया अविवाहित लड़कियाँ भी करवा चौथ मनाने लगी.

करवा चौथ के दिन व्रत के अलावा नारी साज़ – शृंगार करती हैं. आज के ज़माने में उनका ब्यूटी पार्लर में जाना आम बात है. मेहन्दी भी जोरो शॉरो से लगाया जाता है.

ख़ासी खाद्य पदार्थ जो उन्हे उनके ससुराल वाले देते हैं उसे सरगी कहा जाता है.

छन्नी से चाँद देखने के बाद वो चाँद का जल अभिषेक करते हैं एक छोटे से हाँडी से जिसे कड़क कहा जाता है. इसके उपरांत वो पानी पीते हैं अपने पति के हाथों.

आज के युग में जहाँ तकनीकी तरक्की ने रिश्तों को नया आयाम दिया है. जहाँ लोग ऑनलाइन रिश्ता बना के तो रखते हैं पर असल ज़िंदगी में दूरियाँ बढ़ रही हैं, करवा चौथ जैसे मौके आपको ये याद दिलाते रहते हैं की कुछ दिल के रिश्ते आमने सामने ही निभाए जाते हैं. क्यूंकी दिल का रिश्ता बड़ा ही प्यारा है, क्यूँ गाना तो सुना ही होगा आपने?

हंसते हुए चाँद को क्यूँ देखना गणेश चतुर्थी पे पढ़ता है भारी?

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गणेश को लोग विगनहर्ता के रूप में जानते हैं. लोग उन्हे सबसे पहले पूजते हैं पर उनका एक विकराल रूप भी है. कहानी उस गणेश की जिसने खुद चंद्रमा को श्राप दे दिया था की वो कभी दिखेंगे ही नही. तो क्या है किस्सा आइए जानते हैं.

खानेके बेहद शौकीन और लड्डू और मोदक पे जान छिड़कने वाले गणेश को एक बार एक भोज पे बुलाया गया. माहौल खुशनुमा था और खाने के लिए अलग अलग 51 से ज़्यादा व्यंजन थे.

गणेश को मालूम पड़ा था के दोस्त की अर्धांगिनी बेहद अच्छा खाना पकाती हैं. लंबोदर ने पेट भरके खाना खाया और पूरा आनंद लिया भोज का.

सजे धजे गणेश काफ़ी अच्छे लग रहे थे, खाने के बाद वो मूषक पे सवार  वापस घर की तरफ निकले.

मोदक और लड्डू गणेश ने इतना खाया की उनका पेट बाहर गया. मूषक उनका भार ना ले सके और लड़खड़ाए और गणेश गिर पड़े.

गिरते साथ गणेशा का पेट फॅट गया और सारे लड्डू बाहर गये. पास से गुज़र रहे एक साँप को गणेश ने पकड़ा और अपना पेट बाँध लिया. उन्हे लगा किसी ने देखा नही उन्हें पर चाँद देख के हंस पड़ा.

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गुस्सा में गणेश ने उन्हें श्राप दिया की वो बाहर नही आएँगे. जैसे जैसे दिन बीते मालूम पड़ा उनका ये श्राप धरती वासियों को भारी पढ़ रहा है. दुनिया में हड़कंप  मच गया. जीव जन्तु, पेड़ पौधे और इंसान सब त्रस्त थे. धरती फटने लगी थी, समुद्र में उफान आने लगा था और हर तरीके से पर्यावरण अपना संतुलन खोने लगा था.

जब सारे देवी देवताओं ऑर आम जनता को लगा की ये कुछ ठीक नही हो रहा तो सब ने मिलके गणेश की वंदना की. उनसे आग्रह किया की वो जल्द से जल्द कुछ हल निकालें.

 घोर तपस्या के बाद,  सब ने गणेश को माना ही लिया. गणेश ने अपने श्राप को वापस तो लिया लेकिन एक शर्त पे. उन्होने कहा की रात को चाँद बाहर निकल सकते हैं पर उन्हे कोई भी गणेश चतुर्थी के दिन नही देखेगा. जो देखेगा वो गणेश को नाराज़ करेंगे और उनपे चंद्र दोष लगेगा.

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इसी लिए भद्रपाड़ा महीने के चौथे दिन को जब गणेश चतुर्थी होता है तो कोई चंद्रमा की ओर आँख उठा के नही देखता है.

और इससे बचने का एक मात्र उपाए है की आप स्यामांटका मनी की कहानी सुने और चावल, हल्दी और चंदन को आपके माथे पे छिड़कायं.

वो मखमली आवाज़ का जादूगर जिसने पंडित नेहरू को धराशायी कर दिया था

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मखमली आवाज़ के जादूगर मोहम्मद रफ़ी एक बहुत ही हर दिल अज़ीज़ फनकार थे. जिस पाकीज़गी के साथ वो भजन गाते थे उसे सुनने के लिए हर शक़स बेताब रहता. अनगिनत हिट्स दे चुके रफ़ी उन चुनिंदे नगीनों में से थे जिन्होने ना केवल हिन्दी में बल्कि अलग अलग भाषाओं में अपने आवाज़ का जादू बिखेरा.

यून तो कई किससे रफ़ी साब के मशहूर हैं पर उनका एक किस्सा काफ़ी प्रचलित है. रफ़ी एक शाम अपनी एक कार्यक्रम के लिए पहुँचे. ऑडियेन्स में ज़रा सा भी जगा नही बचा था. उनके चाहने वाले जो उनसे बेशुमार मोहब्बत करते वो रफ़ी साब के एक दर्शन के लिए बेताब थे.

पब्लिक के बीच बैठा एक ख़ास शक़स आम आदमी की तरह सबके बीच बैठा रहा. रफ़ी साब आए और उन्होने अपना गायन शुरू किया. बेहद माँग पे रफ़ी साब ने चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे गाया. पल भर बाद वो ख़ास शक़स रो पड़ा. वो शक़स और कोई नही पूर्व प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे.

इस वाक़ये ने रफ़ी और पंडित नेहरू को काफ़ी करीब ला दिया था. दोनो एक दूसरे की इज़्ज़त भी करते और कभी मिल भी लेते. ऐसे ही एक मुलाक़ात ने एक और किस्सा दुनिया को दिया. उस दिन पंडित नेहरू चाट खा रहे थे. खट्टी दही से बनी चाट को जब नेहरू ने रफ़ी साब को ऑफर किया तो मालूम पड़ा की रफ़ी सेहत का ख़ास ध्यान देते हैं, ख़ास कर गले का जो गायक के लिए ब्रह्मास्त्र से कम नही होता.

जब रफ़ी ने पंडित नेहरू से कहा की माफ़ कीजिएगा मैं ये खा नही सकता तो नेहरू बोल पड़े अरे मैं आप को और कुछ खिलाऊँगा नहीं, ले लीजिए

इसके बाद जो रफ़ी साब ने बोला उसने नेहरू का दिल जीत लिया. वो बोले पंडित जी अगर मेरी आवाज़ सिर्फ़ मेरी होती तो मैं ज़रूर खा लेता लेकिन अब मेरी आवाज़ सिर्फ़ मेरी नही रह गयी है, अब ये पूरे हिन्दुस्तान की हो गयी है, जिसका ख्याल मुझे रखना ही पड़ता है.

नेहरू ने तुरंत रफ़ी साब को गले लगा लिया और उनके पीठ को थपथपाते हुए शाबाशी दी.

शायद उनकी खूबियों और गायकी के महारत की वजह से ही मन्ना दा ने उनके बारे में कहा था की रफ़ी सब कुछ गा सकते हैं, जो जल्दी हर कोई नही कर पाता.

रफ़ी ने अपने लंबे करियर में हर उस भाषा में गाया जो उनके रेंज के अंदर थी और उसकी फयरिस्ट लंबी है.

रफ़ी ने हिन्दी के अलावा तेलुगु, कन्नडा, गुजराती, उर्दू, पंजाबी, ओड़िया, बंगाली, भोजपुरी, मराठी, सिंधी और कोंकनी में गाना गाया. विदेशी भाषाओं में उनको डच, क्रीयोल, पर्षियन, सिनलीज़, इंग्लीश और अरबिक भाषाओं में भी काम करने का मौका मिला. OP नय्यर ने अगर आशा के साथ कई यादगार नगमे दिए तो पुरुष प्लेबॅक गायक में रफ़ी के साथ उनकी जोड़ी को काफ़ी सराहा गया.

अमृतसर के पास स्थित गाँव कोटला सुल्तान सिंग में रफ़ी आज़ादी के काफ़ी वर्ष पहले जन्मे. शास्त्रिय संगीत में अपने आप को माहिर बनाने के लिए उन्होने उस्ताद घुलाम अली ख़ान के सात रियाज़ किया. उन्होने संगीत जगत में पहला काम पंजाबी फिल्म गुल बलोच के लिए किया ज़ीनत बेगम के लिए, गाना था ‘सोणिये नि हीरिए नि’ कॉंपोज़िशन था श्यामसुंदर का.

“उड़े जब जब ज़ूलफें तेरी” और “दीवाना हुआ बादल” जैसे रफ़ी साब के गाने आज भी उनको जीवित रखे हैं.

उनके लाईव शोस मसलन—वेंब्ली कान्फरेन्स सेंटर और रॉयल आल्बर्ट हॉल आज भी मशहूर हैं.

पद्मा श्री विजेता मोहम्मद रफ़ी का बुरा दौर तब शुरू हुआ जब किशोर कुमार के सितारे आराधना के बाद बुलंदी पर थे. पर उनकी निष्टा और द्रन निश्चय उन्हे फिल्म्फैर अवॉर्ड और राष्ट्रिय सम्मान से दूर नही रख सकी. हालाकी ये भी उतना ही बड़ा सच है की किशोर और रफ़ी एक दूसरे के लिए काफ़ी संवेदनशील थे.

उनके करियर का आखरी गाना था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के निर्देशन में फिल्म आस पास का “शाम फिर क्यूँ उदास.”

कहा जाता है रफ़ी साब का मन गायिकी के तरफ तब आकर्षित हुआ जब उन्होने एक फकीर को गाते सुना. रफ़ी को एक गाने के लिए सबसे पहले एक रुपये मिले थे.

चाहे वो आप के पहलू मैं आकर रो दिए जैसा गज़ल हो, ओ दुनिया के रखवाले जैसा भजन हो, शंकेर-जैकिशन की कॉंपोज़िशन और शम्मी कपूर पर फिल्माया गया चाहे कोई मुझे जुंगली कहे हो, उनकी गायिकी को टक्कर देने वाला कोई नही था.

सुरों के सरताज मोहम्मद रफ़ी ने देशवासियों की आँखें नम तब कर दी जब वो दुनिया को जुलाइ 31, 1980 के दिन अलविदा कह गये. कहा जाता है लाखों की तादात में लोग शोक में डूबे थे

आर पार, बैजू बावरा, बरसात की रात, दोस्ती, एक मुसाफिर एक हसीना, हम दोनो, प्यासा, शहीद, तीसरी मंज़िल जैसे अनगिनत फिल्मों में गाने वाले रफ़ी जब परलोक सिधार गये तो मुंबई में एक जन सैलाब सड़कों पे टूट पड़ा उनकी अंतिम यात्रा में श्रद्धांजलि के लिए.

ऐसे युग में जब हर कोई फनकार मानता है खुद को, रफ़ी जैसे सज्जन कलाकार आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत रहेंगे क्यूंकी उन्होने मेहनत, लगन और उपर वाले की रहमत से सबका दिल जीत लिया.

1971 युद्ध के एक जाँबाज़ हिन्दुस्तानी जासूस के किरदार में काफ़ी जच रही हैं आलिया भट्ट

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आलिया भट्ट का कॉफी वित करन का शो किसे नही याद होगा. उस शो के लिए उन्हे काफ़ी मज़ाक झेलने पड़े थे लेकिन वो उन सब से उभर के एक नायाब नगीना बन के बॉलीवुड में उभरी हैं. राज़ी का ट्रेलर आज कल चल रहा है एक बार फिर वह चर्चा का विषय बनी हुई हैं अपने रोल के लिए. ये मई 11 को रिलीस होगा

संस्कृत में कहते हैं “जलमेव यस्या बालमेव तस्या” अर्थात जो समुद्रा को जीत सकता है वो सबसे बलवान होता है. आज भारत को INS विराट पे गौरव है पर अगर सहमत ना होती तो शायद हम इसे खो देते.

हाँ आलिया भट्ट सहमत का किरदार अदा करती हैं. राज़ी एक सच्ची घटना पर आधारित है जिसकी मुख्य पात्रा हैं हरिंदर स सिक्का के किताब कॉलिंग सहमत की नायिका.

मेघना गुलज़ार की फिल्म राज़ी में आलिया एक भारतीय जासूस का रोल अदा करती हुई नज़र आएँगी.

हालाकी उनको पूरी खबर पता थी पर सिक्का ने पहचान गुप्त रखने के लिए उस युवा नायिका की पहचान पाठक से सहमत ख़ान के तौर में कराई.

सहमत ख़ान के बारे में  जानकारी ये है की वह एक अमीर उद्योगपति के घर जन्मी थी कश्मीर में. भारतीय इंटेलिजेन्स ने उनकी शादी एक पाकिस्तानी आर्मी ऑफीसर से करवाई जिससे वो पल पल की जानकारी देती.

सहमत की ही बदौलत INS विराट को भारत डूबने से बचा पाया.

माना जाता है उनके पाकिस्तान में रहने के दौरान उन्होने जनरल यहया ख़ान के नाती पोतों को पढ़ाया भी. अपना देश के प्रति फ़र्ज़ अदा करने के बाद वह भारत लौट आईं और उस समय वह एक जाँबाज़ सिपाही की मा भी बनी.

आलिया ने हाल्ही में जिस भी फिल्म में काम किया उस की तारीफ हर कोने से आई है. एक ऐसे समय में जब सेलेब्रिटी के बच्चे अपने मा पिता के छत्रछाया में बॉलीवुड में एंट्री लेते हैं, वोहीं आलिया खुद अपनी तक़दीर लिखने में सक्षम हैं.  जंगली पिक्चर्स और धर्मा प्रोडक्षन्स का राज़ी हर कोई देखने को उत्सूक है.

ना ही ट्रेलर रिलीस हुआ है बल्कि तीन पोस्टर भी काफ़ी पसंद किए जा रहे हैं.

प्लॉट भारत पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाओ पर आधारित है. सहमत के पति इक़बाल का किरदार अदा कर रहे हैं विकी कौशल.

सहमत को एक समझदार बेटी, अच्छी पत्नी और एक निडर जासूस के रूप में दिखाया गया है

निर्देशक हैं मेघना गुइलज़ार और प्रोड्यूस किया है करन जोहर ने.

इस फिल्म को शूट किया गया है पटियाला के नभा शहर, संगरूर के मालेर्कोटला और बडगाम के दूधपात्री में.

एक दिन के अंदर फिल्म ने  4,874,408 व्यूस हासिल किए जिससे ये #1 ट्रेंड बन गया Youtube पर.

आलिया भट्ट और विकी कौशल के अलावा फिल्म में अन्य रोल्स में नज़र आएँगे रजित केपर, शिशिर शर्मा, ज़ैदीप अहलावट, आश्वत भट्ट, अमृता खानविलकर और सोनी राज़दान.

अपना करियर संघर्ष से शुरुआत करने वाली आलिया ने बहुत कम समय में अपनी एक अनूठी छाप इंडस्ट्री पर छोड़ी है. करन जोहर के स्टूडेंट ऑफ दी यर में 2012 में उन्हे ख़ासा पसंद किया गया. छे साल और दस फिल्म्स के साथ वह अब ऑफबीट फिल्म्स के लिए एक दम पर्फेक्ट चाय्स हैं.

कमर्षियल और ऑफबीट में सामंजस्या शायद ही कोई आलिया से बेहतर बना पाया हो.

इम्तियाज़ अली का हाइवे हो, 2 स्टेट्स हो, हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया या फिर शानदार और उड़ता पुंजब हर केरक्टर को आलिया ने बाखूबी पिया और जिया.

कपूर आंड सोंस, डियर ज़िंदगी और बद्रीनाथ की दुल्हनिया ने उनको नयी ऊँचाईओं तक पहुँचाया.

राज़ी एक बार फिर उनको एक अलग अंदाज़ में देखने का मौका है. इस बार भी आलिया की जीत तो पक्की है.

A Karva Chauth night that planted idea of Indiyapa in Captain Vinod Dubey’s mind

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Captain Vinod Dubey and his fellow colleagues were travelling from Australia to Japan onboard a ship. It was a Karva Chauth day and he would repeatedly turn a gaze towards the starry sky in search of the moon. He had also asked his close friends to inform if they spotted the moon while on a cleaning task on the deck. With many surprised as to what was going on, they enquired of this typical curiosity.

Vinod told them that this was a day when a better half fasts for the entire day in India and then breaks her fast after the moon is spotted. Pat came the reply Yaar Ajab Indiyapa Hai. That day itself he decided that he would one day fulfil that one crazy wish to write a book on the uniqueness of Mother India.

As a man who wanted to follow his heart and write about something that gives him peace, he wrote 20 pages about Varanasi and showed it to colleague Sagar Shukla. Sagar along with other well meaning souls guided and pushed him to go about with the penchant to write a book.

He would each day while travelling to office take a one hour bus ride and utilize the time to write his draft.  An old lady was kind enough to keep him in high spirits to finish the book, who also said that she would love to go through the book once done.

While there were troubling phases like that of a broken ankle which made him absolutely immobile courtesy a recovery process, he spent one month and a half religiously to finish the final draft. And that’s how Indiyapa was ready to move to the publishers. Published by Hind Yugm and with artwork by Vijendra S Vij, Indiyapa has already sold over 1000 copies on Amazon in less than a week.

All this amidst keeping pace with his love for badminton, marathons and other day to day activities that keep him busy.

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The book primarily on Banaras has varied stories and elements from other cities of India as well. Written in simple lucid language, the protagonist of the book Shuklaji is simple, clean and down to earth.

Vinod says that it is about a 60s person who is different from the typically brash gentry you will find in these days. He calls emotions his USP.

Vinod Dubey became a captain in 2010. Having spent 3 years with the Singapore Shore Management for him Singapore is like a fair in a village. A beautiful place that gives you the feel of a destination out of this world.

He cannot stop praising his better half Shweta for her support.

His biggest inspiration was his mentor Suryabhan Singh who taught him that if you study well and show solid commitment things change. In a world where you need to know English to prove you are a cool dude, he trained 3 years to learn the language.

Busting the myths about a very colourful life at the merchant navy, Vinod who hails from Bhadohi known for its carpet industry says that he Joined the Merchant Navy after doing everything that a normal person would have experienced and done in life.  Rubbishing the chatter that merchant navy members are globe trotters, he is quick to add they have to do a lot of back breaking work. Unlike popular perception a ship does not even wait at a port for six hours, he rues.

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He laughs and says, “It is a life filled with isolation. With alcoholism having proven disastrous for many a person on ships liquor is now a complete no for those on sail. While money is not an issue for those with the Merchant Navy, the flipside is that one spends two months in land and seven months onboard a ship which is no less than jail since we are cut off from the world.”

So if you are tired of the Qtiyapa and Cyapa of life you should definitely grab a copy of Indiyapa – When Bollywood Met Reality wriiten by a Mango Man for the people of this country. While each village wants to be at par with a Delhi or Mumbai, the book talks about the simple pleasures of village life.