प्रदेश के अन्नदाता पर भारी कोरोना का मार, भविष्य पर गहराती उनकी चिंता

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मथुरा के महेंद्र सिंह कुछ दिनों से खांस रहे थे और छींक रहे थे। भारत में बढ़ते कोरोना के डर, उत्सुक और असहाय होने के बीच, उन्होंने डरते हुए अपनी जान ले ली । भारत प्रतिबंधों के तहत है, किसान जो इस देश की जीवन रेखा हैं, वह असहाय महसूस कर रहा है। अफसोस की बात है कि उन्होंने कभी मेडिकल टेस्ट नहीं कराया। मुंडेसी गांव के एक निवासी उन्होंने कुएं में कूदकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, जहां से उसके शरीर को निकाला गया । 36 वर्षीय चौथे किसान थे जिन्होंने कोरोना के समय में अपनी जान ले ली। उनका राज्य में यह चौथा आत्महत्या है। इससे पहले 24 मार्च को बुखार और खांसी से पीड़ित एक युवक ने कानपुर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, उसे डर था कि वह कोरोनोवायरस से पीड़ित है।

पिछले महीने, दो अलग-अलग घटनाओं में, हापुड़ और बरेली में दो युवाओं ने आत्महत्या कर ली। ये सभी प्रदेश के किसान बिरादरी से हैं जिनको आने वाले समय के परिस्थितियों,  ख़ासकर कोरोना तांडव से डर तो लग ही रहा था, उनके  मन में खेती किसानी का आगे  का रास्ता भी कचोट रहा था।

म.प्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश पहले से ही कटाई के बीच में हैं, जो अगले एक सप्ताह  भर और समय की बात है । लॉकडाउन के कारण किसानों को कटाई हुई उपज को मंडियों तक ले जाना असंभव हो रहा है। राज्य यह महसूस कर रहे हैं कि यदि फलों और सब्जियों की कटाई प्रभावित होती है, तो इससे कीमतों में अचानक उछाल आएगा। फसल के मौसम में दो सप्ताह, किसानों को नुकसान होता है कि कैसे काम पूरा किया जाए क्योंकि सरकार ने वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया है। घर पर रहने वाले किसानों के साथ ड्राइवर और मजदूरों ने फसल काटे जाने में कठिनाई की शिकायत की है।

कोरोनावायरस महामारी एक ऐसे समय में आई है जब देश में फरवरी – मार्च के मौसम का अप्रत्याशित रूप देखा गया है। बारिश और ओलावृष्टि से रबी की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। भारत में किसान लगातार तनाव में बने हुए हैं। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने किसानों के साथ पूरी सहानुभूति जताई है। फसल की कटाई और रबी फसल बेचने का आह्वान करते हुए, किसानों को आवश्यक कृषि निवेश प्रदान करते हुए, सरकार ने सुनिश्चित किया है कि कटाई शुरू हो।

योगी सरकार ने कई कृषि क्षेत्रों को तालाबंदी से मुक्त कर दिया, जो फल देने लगे हैं। राज्य के किसान लॉक डाउन को ध्यान में रखते हुए अपनी फसल काट रहे हैं। ऐसे किसानों को एक विशेषज्ञ से जुड़ने और बात करने का विकल्प मिलने की आवश्यकता को देखते हुए, जो सही तरह का मार्गदर्शन दे सके, वाराणसी ने अब एक ऐसी लाइन खोली है जहाँ इन किसानों को दिल की बात करने का मौका मिल सकता है। डीएम वाराणसी, कौशल राज शर्मा ने एक कंट्रोल रूम स्थापित किया है जहाँ एक किसान बोल सकता है। विकास भवन में नियंत्रण कक्ष के पेशेवर समस्याओं को हल करने का प्रयास करेंगे।

योगी सरकार ने घोषणा की है कि खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर समय पर शुरू होगी। इसी क्रम में 2 अप्रैल से सरसों, चना और मसूर की खरीद शुरू हो गई है, इससे बुंदेलखंड और आगरा के किसानों को कुछ राहत मिली है। रिपोर्ट कहती है कि सरकार क्रमशः 2.64 लाख मीट्रिक टन सरसों, 2.01 लाख मीट्रिक टन चना और 1.21 लाख मीट्रिक टन मसूर एमएसपी किसानों से खरीदेगी। ये खरीदारी 90 दिनों के लिए होगी।

दूसरी ओर, चालू रबी सीजन में फरवरी-मार्च का मौसम अप्रत्याशित रहा है। सरकार ने बीमा कंपनियों से किसानों को समय पर नुकसान की भरपाई करने का आग्रह किया है। सभी जिलों के डीएम को इस सर्वेक्षण कार्य के लिए बीमा कंपनी के साथ कृषि और राजस्व विभाग के कर्मचारियों को पास जारी करने का निर्देश दिया गया है। 90 हजार से अधिक किसानों के आवेदन बीमा कंपनियों के पास आए हैं। देश में 85 प्रतिशत किसानों के पास तीन एकड़ से कम जमीन है और उनकी फसल का पूरा पैसा ब्याज सहित कर्ज चुकाने में खत्म हो जाता है।

खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद, ये किसान मजदूरी कमाते हैं और दुकान से अपना घर का राशन खरीदते हैं। विशेषज्ञ व्यापक रूप से बताते हैं कि तालाबंदी के दौरान अन्य देशवासियों के साथ-साथ छोटे और मध्यम किसानों और मजदूरों को राशन देना अनिवार्य होना चाहिए। जबकि भारत कोरोना से सुरक्षित रहने की कोशिश कर रहा है है, किसान आने वाले दिनों में फसलों और देशवासियों के भोजन के बारे में सोच रहे हैं। उत्तरी भारत में पिछले महीने ओलावृष्टि के कारण सरसों, मसूर आदि की फसलें नष्ट हो गई थीं, आज गेहूं और अन्य रबी फसलें तैयार हैं और लॉकडाउन खत्म होने से पहले कटाई का समय आ जाएगा। किसान और संबद्ध क्षेत्रों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार द्वारा 100 रुपये प्रति क्विंटल अनुदान देने की घोषणा की जा रही है। पिछले महीने की ओलावृष्टि से किसानों को हुए नुकसान की भरपाई बीमा कंपनियों या सरकार को ही करनी चाहिए।

संपादकीय अब सरकार से छह महीने के लिए ऋण चुकौती को स्थगित करने और ब्याज माफ करने का आह्वान करते हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के किसान गेहूं की कटाई के बाद गन्ने की बुवाई करते हैं। सरसों, मसूर आदि की फसलें खराब हो गई हैं, किसान भी गन्ना लगाने की तैयारी कर रहे हैं।

पिछले कुछ सालों से, 90 प्रतिशत ग्रामीण युवा कृषि से बतौर पेशा दूरी बनाए हुए हैं, उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। जो लोग नौकरी कर रहे थे, उनको नोटेबंदी के चलते काम गवाना पड़ा।

इसके अलावा रियल एस्टेट बाजार में मंदी ने श्रमिकों को गांव में वापस ला दिया है। जिनमें से कई को मानसिक और भावनात्मक कमजोरी के चलते ड्रग्स का सहारा लेना पड़ा है। इसने अपराध के ग्राफ को भी बढ़ा दिया है।

कोरोना से निजात दिलाने के लिए एक अनोखा सुरंग

कोरोनवायरस से लड़ने के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए, उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र गोरखपुर में एक सॅनिटाइज़र टनेल नामक एक अनूठी पहल शुरू की है। सॅनिटाइज़र टनेल महेवा फल और सब्जी बाजार में है। विशेष रूप से सुरंग के माध्यम से एक मार्ग कोरोना संक्रमण से बचाने में मदद करेगा।
रिपोर्टों से पता चलता है कि बहुत जल्द बीआरडी मेडिकल कॉलेज में एक सॅनिटाइज़र टनेल आ जाएगी। सैनिटाइजर टनल का उद्घाटन होना बाकी है। जबकि टनेल तैयार है, एक औपचारिक एनओसी की प्रतीक्षा है। सॅनिटाइज़र टनेल में इस्तेमाल होने वाले आवश्यक रसायनों का भी इंतजार किया जा रहा है। इस बारे में भी सवाल हैं कि रसायनों के रिलीज में देरी क्यों हुई है। पुलिस की एक टीम यह सुनिश्चित करेगी कि मंडी आने वाले किसी भी व्यक्ति को टनल के अंदर से गुज़रना पड़े, सुनिश्चित करने के लिए बल तैनात किया जायगा।
20 से 30 सेकंड की छोटी अवधि में, इस सॅनिटाइज़र टनेल में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को सिर से पैर तक आसानी से साफ किया जा सकेगा। सेंसर फव्वारे के माध्यम से सैनिटाइजर के आसान रिलीज में मदद करेंगे।

फीका पढ़ता शाह मुमताज़ की नगर आगरा में पर्यटन का रोमांच

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कोरोना के चलते,  लोगों को शायद ही आज कल कभी वाह ताज कहने का मौका मिलता है। शाहजहाँ और मुमताज के शहर में पर्यटन बड़ा झटका खाया है । शहर में पर्यटन के क्षेत्र में अपंग होने के साथ, बहुत कम लोग इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि कब पर्यटक यहाँ आना शुरू करेंगे । यह व्यापक रूप से माना जाता है कि शासन की नीति भविष्य का फैसला करेगी। जिन लोगों ने पहले से योजना बना रखी थी, उन्हें अपनी यात्रा की योजना रद्द करनी पड़ी। उन्होंने मई-जून के टिकट रद्द कर दिए हैं, लेकिन टूर एजेंट इस राशि को वापस नहीं कर पा रहे हैं। कुछ ने राशि वापस कर दी होगी, लेकिन अब ईएमआई का भुगतान करना मुश्किल हो रहा है।
ज्यादातर आगरा रिफंड एयरलाइन पैकेजों में देखा गया है। एयरलाइंस जो 15 मार्च तक हर रद्द बुकिंग की राशि वापस कर रही थी, अब ऐसा करने से खुद को रोक रही है। ग्राहकों को अब 31 दिसंबर तक किसी और तारीख में समायोजन करने के लिए कहा जा रहा है। ग्राहकों से कमीशन लेने वाले एजेंट अपनी जेब से इतनी बड़ी रकम वापस करने की स्थिति में नहीं हैं।
न केवल एयरलाइंस बल्कि शहर के पांच हजार से अधिक टैक्सी ऑपरेटरों को चार धाम यात्रा, अमरनाथ, शिमला, कुल्लू, मनाली, नैनीताल, लद्दाख आदि की बुकिंग रद्द करने के लिए संदेश मिल रहे हैं। 15 मई से 31 मई तक बुकिंग को अंतिम रूप से रद्द किया गया है। जिनकी बुकिंग 1 जून से 30 जून तक है, इन लोगों ने भी रद्द करने के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया। इस अवधि के दौरान लगभग पचास प्रतिशत पैकेज रद्द कर दिए गए हैं।
हाल ही में, कुछ एजेंटों को जुलाई महीने के लिए पैकेज को रद्द करने के लिए कहा गया है। अब एक चिंता पैदा हो गई है कि अगर जुलाई के महीने में भी बुकिंग नहीं हुई, तो वे कैसे बचेंगे। ऑपरेटर अब कर राहत के लिए बुला रहे हैं, अन्यथा वे दावा करते हैं कि उनका अस्तित्व संकट में होगा।

आ गया है देवरिया की धरती पर नन्हा लॉकडाउन

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भारत एक विशाल विविधता का देश है। यूपी में भी विभिन्न समुदायों और जातियों के लोग शांतिपूर्वक साथ रहते हैं। ऐसे समय में जब राष्ट्र कोरोना का सामना कर रहा है, देश इस समय अपने संक्रमण से निपटने के विभिन्न तरीकों के बारे में सोच रहा है। देवरिया में एक परिवार ने कुछ ऐसा किया, जो उन्हें सुर्खियों में लाने लायक बना रहा है।

यूपी के देवरिया जिले में, कोरोना के खिलाफ लड़ाई के दौरान गांव में पैदा हुए बच्चे का नाम लॉकडाउन रखा गया है। यह दुनिया में किसी बच्चे का पहला ऐसा नाम होगा। अन्यथा, कोरोना के साथ युद्ध लड़ने वाले देश इस तरह के नाम की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

देवरिया जिले के खुखुंदू गांव में सोमवार को पैदा हुए एक बच्चे का नाम उसके माता-पिता ने ‘लॉकडाउन’ रखा है। पिता ने कहा कि लड़के का नाम हमेशा लोगों को स्व-हित से पहले राष्ट्रीय हित की याद दिलाएगा।

पवन ने कहा कि वह और उनका परिवार लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं और यहां तक कि अपने रिश्तेदारों से भी कहा है कि जब तक लॉकडाउन नहीं हट जाता तब तक वे उनसे न मिलें।

बच्चे के माता-पिता का मानना है कि कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए लॉकडाउन लागू किया गया था। देश के हित में कुछ किया और लोगों को बचाने का एकमात्र तरीका है। बालक का परिवार खुखुंदू शहर से है। जब महिला लेबर में गई, तो पूरा इलाका परेशान था कि डिलीवरी लॉकडाउन के बादल के नीचे कैसे होगी। पवन प्रसाद की पत्नी नीरज देवी को रविवार शाम को पीएससी खुखुंदू में भर्ती कराया गया था। हर जगह चुप्पी होने पर वह परेशान हो गई, लेकिन परिवार ने चुनौती स्वीकार की और महिला को प्रसव के तुरंत बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया।

बच्चे के पिता पवन ने कहा कि बच्चे का जन्म ऐसे समय में हुआ जब पूरा देश कोरोना के साथ लड़ाई लड़ रहा है और देश में तालाबंदी है। ऐसी स्थिति में कोरोना से बचाव का संदेश देने के लिए बेटे का नाम लॉकडाउन रखा गया है।

गोरखपुर में जनता कर्फ्यू ’के दिन पैदा हुई एक बच्ची का नाम उसके चाचा ने कोरोना’ रखा था।

संयोग से, दोनों माता-पिता ‘लॉकडाउन’ और कोरोना शब्द का अर्थ नहीं समझते हैं।

स्क्रॅप धातू से बनी कला अब बढ़ाएँगी शहर की शान

लखनऊ वर्तमान में एक सौंदर्यीकरण परियोजना से गुजर रहा है, जिससे पूरी तरह से सिटीस्केप बदलने की उम्मीद है. कई नई परियोजनाएं शहर लागू हो रही हैं, जिसमें चित्र, ओवरहेड तारों को हटाना और पुरानी सड़कों और पुलों का नवीनीकरण शामिल है.

अब, लखनऊ में प्रमुख चौराहों का चेहरा बदलने के लिए एक नई परियोजना तैयार की गई है. शहर में जल्द ही स्क्रैप की धातुओं से बनी नई मूर्तियां मिलने वाली हैं, जिन्हें लखनऊ के सौंदर्य  में चार चाँद लग जाएगा . ये लगभग 100 चौराहों पर लगाया जाएगा.

लखनऊ स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत अनगिनत बदलावों के दौर से गुजर रहा है जिसमें कई सौंदर्यीकरण परियोजनाएं भी शामिल हैं। इन मूर्तियों का उद्देश्य लखनऊ में सुस्त चौराहों के साथ-साथ पुरानी धातु और स्क्रैप के टुकड़ों को रीसायकल और अपस्केल करना है. परियोजना यह भी सुनिश्चित करेगी कि ये सुशोभित हों. यह शहर में सड़कों और चौराहों पर एक महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा.

वर्तमान में, अभी भी मूर्तियों पर काम किया जा रहा है और सभी चौराहों के नाम जो सुशोभित होने की उम्मीद है, अभी तक सामने नहीं आए हैं. ऐशबाग, कैसरबाग, सिकंदरबाग, पॉलिटेक्निक और कथौता सहित प्रमुख चौराहों पर इन मूर्तियों को स्थापित करने की उम्मीद है. ये विस्तृत मूर्तियां लखनऊवासियों के लिए एक स्वागत योग्य परिवर्तन होंगी, जो चौराहों पर ट्रैफिक लाइट या बुनियादी राउंडअबाउट के आदी हैं.

Uttarkashi awaits its moment of ministerial pride

Serene Uttarakhand

As time ticks, Uttarkashi is a district that is preparing for the Char Dham Yatra which will start this April. But politically all eyes are now on the Trivendra Singh Rawat government as well. As three years of the Trivendra government come to an end, whether the Ganga Yamuna maternal home gets representation in a cabinet expansion remains to be seen. In the past no minister has been able to occupy a berth under BJP rule. Independent Pritam Singh Panwar, who won from Yamunotri under Congress rule in 2012, became a minister in the coalition government.

Before the formation of the state, the entire Uttarkashi district had an assembly seat. At that time, the whole of Uttarakhand  had just 19 assembly seats, unlike the 70 now. Many names such as Brahadatta, Barfia Lal Junwatha, Baldev Singh Arya, Gyanachandra from this region got ministerial positions in different governments. Both the state government and the central government.

 This process has weakened after the formation of a separate Uttarakhand state. In the delimitation after formation of the state, there are four seats in Uttarkashi district. Gangotri, Yamunotri, Purola and Dhanolti.

Of these, the Gangotri, Yamunotri are with the BJP. Purola is with the Congress and Dhanaulti rests with the Independents.

For Uttarkashi region the arguments on representation in the cabinet are umpteen.

The district has not been represented in the BJP rule for a long time. The BJP performs well in every election in this district. Apart from this, there is currently no minister in the Trivendra government from the Tehri Lok Sabha constituency.

The entire district of Uttarkashi comes under the Tehri Lok Sabha constituency. There is only one answer from MLAs to BJP workers and leaders on the question that is, it is for the party and the chief minister to decide, but in informal negotiations, everyone believes that if things happen in view of the development of the frontier region and its strategic importance, then it must be given representation in the cabinet.

However, government spokespersons repeatedly have said that the CM has this privilege. Keeping all the things in mind, the CM has to decide on this.

शायद इसी लिए कहा गया है की झुकने से आदमी कद में बड़ा ही होता है

आदमी कितना भी बड़ा हो जाए पर उसे अपनी जड़ें नहीं भूलनी चाहिए और आज के दौर में ऐसा कम ही होता है की आदमी जड़ों से जुड़ा हो. दुनिया में मशहूर लोग जब ज़मीनी ज़िंदगी की मिसाल पेश करें तो लगता है की हमें भी ज़िंदगी में अपने से बड़े का सम्मान कर के लोगों को बताना चाहिए की हम भी सामने वाले की हैसियत और कद को कभी झुठला के कुछ ऐसा नही करें जिससे वो मनुष्य आहत हो. 

आजकल सोशिल मीडीया पर बहुत जम के वायरल हो रहा है नारायण मूर्ति और रतन टाटा को वो तस्वीर जो आदमी को बताता है की आदमी कामयाबी के उस शिखर पर पहुँच कर फिर झुकना भी पड़े तो झुकने से कतराना नही चाहिए.  यह वायरल फोटो है देश के दो दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा और इन्फोसिस के को-फाउंडर नारायण मूर्ति का.

ये तब की तस्वीर है जब TIECon  मुंबई 2020 कार्यक्रम में रतन टाटा को लाइफ्टाइम अचीव्मेंट अवॉर्ड से नवाज़ा गया. दोनो ही नामी हस्ती, और उनके उमर में नौ साल का फासला.  रतन टाटा 82 साल के हैं तो नारायण मूर्ति 73 साल के हैं.

टाटा और मूरती की दोस्ती काफ़ी पुरानी है. और उनके दोस्ती का किस्सा वाक़ई दिलचस्प है. टाटा और मूरती उस ज़माने से दोस्त हैं जब जेआरडी टाटा (JRD TATA) टाटा ग्रूप के मुख्या थे. उस ज़माने में इन्फ़ोसिस का कोई नाम पता भी नही था. इन्फ़ोसिस की स्थापना 1981 में हुई . पर किस्सा तब शुरू होता है जब सुधा मूरती पहली बार नौकरी की तलाश में घर से बहार निकलीं. उनको इंजिनियरिंग का अच्छा ज्ञान था और उन्होनें म्न्न बनाया की वो विख्यात टाटा ग्रूप में काम करेंगी. जब उन्होंने नौकरी के लिए अर्जी लगाई तो उनकी अर्जी खारिज कर दी गई क्यूंकी वो महिला थीं. जब सुधा को गुस्सा आया तो उन्होनें सीधे टाटा के मुख्या को पत्र भेजा और कहा की ऐसा व्यवहार क्यूँ. जब JRD को उनमें सच्चाई दिखी उन्होने उन्हें इंजिनियर की पोस्ट पर पदासीन किया बतौर पहली महिला इंजिनियर.

सुधा मूर्ति और नारायण मूर्ति की शादी 1978 में हुई. अपनी किताब ‘लास्टिंग लेगेसी’ में सुधा मूर्ति उस घटना का जिक्र किया कि कैसे उन्होंने जेआरडी टाटा को चिट्ठी लिखकर महिलाओं को नौकरी नहीं देने की शिकायत की थी. ये उस ज़माने का वाक़या था जब लड़कियों को पढ़ाई और इंजिनियरिंग करने की इजाजत नहीं थी. लोगों में उस ज़माने में ये मान्यता थी की इंजिनियर बनने का काम तो केवल लड़कों का है.

600 लोगों के बॅच में अकेली लड़की बनी उस ज़माने में जिसे टाटा मोटर्स अर्थात टेल्को  जैसे बड़े ब्रांड ने बाहें फैला कर स्वागत किया, जो अपने क्लास में टॉप करने का कलेजा रखती थी. टाटा की तरफ से इन्हें बुलावा आया और स्पेशल इंटरव्यू लेने के बाद सुधा मूर्ति को टाटा मोटर्स की पहली महिला इंजिनियर के रूप में नौकरी मिली.

सुधा कुलकर्णी शादी के बाद मूरती हो गयीं. 1978 में नारायण मूरती के साथ इनकी शादी हुई. शादी के तीन साल बाद 1981 में इन्फोसिस की स्थापना की गई। उस साल सुधा ने टाटा की नौकरी को अलविदा कह दिया.

आज रतन टाटा और मूर्ती एक ही मंच पर दिखे. रतन टाटा ने समारोह के ख़तम होने के बाद अपने सोशियल मीडीया पर लिखा की बहुत गौरव महसूस करता हूँ कि आज मुझे अपने मित्र नारायण मूर्ति के हाथों से सम्मानित किया गया.

ट्विटर पर काफ़ी पॉपुलर हुआ ये फोटो.

“Infosys co-founder, Narayana Murthy seeks blessings from TATA sons, Chairman Emeritus, @RNTata2000 at #TiEconMumbai. A touching gesture of humility & a historic moment indeed,” लिखा TiE Mumbai ने.

रतन टाटा ने अपना वीडियो शेर करके कहा की मुझे आज बहुत गौरवान्वित महसूस होता है की मैं नारायण मूरती के हाथों सम्मानित हुआ. लोगों ने उनके इंस्टाग्राम स्टोरीस पे इस चीज़ को खूब सर्राहा.

TIE मुंबई ने इसे शेर करके लिखा – “Infosys co-founder, Narayana Murthy seeks blessings from TATA sons, Chairman Emeritus, Ratan Tata at TiEcon Mumbai. A touching gesture of humility & a historic moment indeed.”

Infosys co-founder, Narayana Murthy seeks blessings from TATA sons, Chairman Emeritus, @RNTata2000 at #TiEconMumbai.

A touching gesture of humility & a historic moment indeed. #WednesdayWisdom #narayanamurthy #ratantata

जैसे ही फोटो विराल हुई, एक यूज़र ने लिखा, “Such wonderful mutual respect and admiration for each other.”

आज के दौर में जब छोटा बड़े का तिरस्कार करने से गुरेज़ नही करता, ऐसे में रतन और नारायण की अतरंगी यारी आदमी को ये सोचने में मजबूर करती है की आदर्श दोस्ती और यारा कैसा होना चाहिए.

सिर्फ़ नाम से ही नही, पर काम से भी शरीफ इंसान, जिसने लावारिस लाशों को इज़्ज़त दिलाई

कभी ज़माने ने दिया पागल करार, आज उसी को नसीब हुआ पद्म सम्मान

एक ऐसे दौर में जब मज़हबी दरारें बढ़ती चली गयी हैं, उ.प. के शरीफ चाचा ने आज के ज़माने में एक अलग ही मुकाम हासिल किया है. पद्‍मश्री विजेता मोहम्मद शरीफ को कभी लोगों ने पागल कह के झुटला दिया था क्यूंकी वो लावारिस हिंदू और मुस्लिम लाशों को पंचतत्व में विलीन होने का मार्ग प्रशस्त करते थे. इस पावन कार्य को करते शरीफ चाचा को 27 साल हो गये.

आज जब वो 80 साल की उम्र में पद्म सम्मान से नवाज़े जाएँगे, तो फ़ैज़ाबाद के इस लाल की वाह वाही दूर दूर  तक हैआज तक शरीफ चाचा का एक ही उसूल रहा हैक्या हिंदू, क्या मुसलमान, सबसे आगे  इंसान. उन्होंने हमेशा इंसानियत को तवज्जो दी.

उन्होंने आज तक 3,000 हिंदुओं को सुपुर्दे खाक किया है और 1,500 मुसलमानों को शमशान में क़ब्र दिलाया है. हालाकी मीडिया की माने तो ये आँकरा तक़रीबन 25,000 है. इस अच्छे कार्य का सिलसिला 27 साल पहले तब उनके ज़हन में आया जब उनके अपने बेटे की लाश कटी हाल में एक रेलवे ट्रॅक पर उन्हें मिली थी, जिसे जानवरों ने नोच खाया था.

उन्होंने तभी मन बना लिया था की जिस तक़लीफ़ से वो गुज़रे, वो किसी और को झेलने नही देंगे. इत्तेफ़ाक़न जब ये बात उन्हें पता लगी की वो पद्मा सम्मान से नवाज़े जाएँगे, वो एक मज़ार को सॉफ कर रहे थे. उन्हें जिलाधिकारी ने हाथ पकड़ के बताया की वो इस सम्मान के हक़दार हैं और उन्हें एक गुलाब भी भेंट किया गया.

पेशे से साइकल ठीक करने वाले मेकॅनिक, शरीफ एक छोटे से रेंट के घर में रहते हैं. जब वो एक समय लाश को ढो के ले जाते तो बहुतों ने उन्हें ना केवल हँसी का पात्र बनाया, बल्कि उन्होंने पागल भी करार दिया. बहुत दिनों तक हँसी झेलने के बाद एक दौर ऐसा भी आया जब उन्ही के तरह सोच रखने वाले लाल बाबू, चाँद बाबू, पप्पू भय्या, पटेल बाबू, शरद भय्या और बहुतेरों ने उनकी ना केवल सराहना की, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने का हिम्मत दिया.

प्रशासन ने उन्हें धनराशि तो नही दिलाई पर एक ऐसा जगह ज़रूर दिलाया जहाँ वो हिंदुओं को मुखाग्नि दे सकते. उन्होंने एक मृत देह को ढकने का प्रबंध भी किया.

शरीफ के दो बेटे हैं – शकील और अशरफ. तीसरा बेटा छे महीने पहले चल बसा. पत्नी को ऐसा झटका लगा की वो इस शोक से पूरी तरह उभर नही पाईं. चाचा को मीडिया इंटरव्यूस में कहते सुना गया है की मीडिया वालों ने ही उन्हें एक बेहतर छवि का इंसान  बनाया जिससे लोग उनके काम को जान पाए.जिस रकाबगंज के तादवली ताकि सेमेट्री में लाशें रहती हैं वोहीं पर लिखा है लावारिस मय्यत/ मिट्टी का गुसलखाना. चाचा बराबर समय निकालते हैं की कैसे वो पोलीस स्टेशन्स, हॉस्पिटल्स, रेलवेस स्टेशन्स, मॉर्चुवरी सबसे जानकारी जुटा कर फिर लोगों की ज़िंदगी छू सकें. जब बहत्तर घंटों तक कोई आगे नही आता, तो वो क्रियाकर्म में मदद करते हैं. जैसे जैसे समय बीता जो लोग हंसते, वोही आज उन्हें इज़्ज़त भी बक्ष आगे आये हैं. संतोष, मोहम्मद इस्माईल और श्याम विश्वकर्मा और उन जैसे तमाम लोग अब उनका हाथ बटाते हैं.

“मैं पारंपरिक शिल्प को समकालीन दृष्टिकोण के साथ जोड़ता हूं”- शैलेश पंडित

  • हमें अपनी परंपरा का निर्वहन करना चाहिए।
  • सिरेमिक आर्ट अपरंपरागत और अभिनव के लिए है…जो प्रकृति से संबंधित है…जो पांच तत्व हैं (आग,हवा,पानी,आकाश और पृथ्वी)

शैलेश पंडित कला में प्राप्त पद्मश्री बी आर पंडित के सुपुत्र हैं। बातचीत के दौरान शैलेश ने बताया कि मैं नेचर को लेकर काम करता हूँ। प्रकृति में विभिन्न प्रकार के टेक्सचर मिलते हैं। मैं उन्हें बहुत करीब से देखता हूँ और उन्हें अपने विचारों के साथ जोड़ता हूँ फिर अपने सिरेमिक कलाकृतियों के साथ उनका प्रयोग करता हूँ। जैसे पेड़ों के तनों पर छाल (जडरिंग) को लेकर, पहाड़ो और खड्डों को लेकर भी मैंने तमाम उन टेक्सचर को अपने काम के साथ जोड़ता हूँ।
मिट्टी के बर्तन बनाना हमारा पुस्तैनी काम है। हमारे दादा जी बर्तन बनाते थे, पिता जी ने उस परंपरा को बढ़ाते हुए कुछ प्रयोग किया। मैं भी उसी परंपरा को निर्वहन कर रहा हूँ लेकिन उस परंपरा को आज के समकालीन कला से जोड़ते हुए। मैं पारंपरिक शिल्प को समकालीन दृष्टिकोण के साथ जोड़ता हूं,”
मिट्टी से चीजों को बनाना समय, प्रयास और अभ्यास लेता है। बड़े ही धैर्य की जरूरत होती है। मिट्टी के बर्तनों को सजाने और रचनात्मकता प्रदान करने की आदिम और व्यापक कला माना जाता है।मिट्टी के बर्तन से बने पदार्थ आमतौर पर उपयोगी होते हैं, उदाहरण के लिए पानी का भंडारण करने वाले बर्तन या प्लेट, कटोरे जो भोजन परोसने और खाने में उपयोग किए जाते हैं।मिट्टी को मूर्तियों, सजावटी वस्तुओं और क्या नहीं, के रूप में बदल दिया जाता है। मिट्टी पृथ्वी का एक प्राकृतिक तत्व है जो लाखों वर्षों से पृथ्वी की पपड़ी के भीतर चट्टान के विघटन के बाद बनती जाती है। एक कुम्हार अपने उत्पाद को न केवल अपने हाथ से बना सकता है बल्कि कई तरह से अपने तरीके से पहिये से बना सकता है।मिट्टी के बर्तन बनाने के कई तरीके हैं और यह सब उन कलाकारों पर निर्भर करता है जो इसे बनाते हैं।
शैलेश डेकोरेटिव के लिए ग्लेज का इस्तेमाल करते हैं। अपने विचारों के साथ प्रयोग करते हैं। शैलेश , वीर कोटक के साथ मिलकर सेरामिक इंस्टालेशन शीर्षक ” एमिनेंट सिटीजन” जो दिल्ली के श्राइन गैलेरी में मार्च 2018 को किया। इसमें सेरामिक के बने काफ़ी संख्या में बॉक्स फॉर्म है।7 बॉक्स (7 फ़ीट) । जो एक पिलर्स का रूप धारण किये हुए थे। सातों बॉक्स एक दूसरे के ऊपर रखे हुए थे। जिसके पीछे एक संदेश है। हर पिलर में अलग टेक्चर है हर टेक्सचर समाज के अलग अलग वर्ग को प्रदर्शित करते हैं। पिलर के सबसे टॉप पर एक गोल्डेन बॉक्स है। गोल्ड बॉक्स जो सबसे सुपीरियर सोसाइटी को दर्शाता है। इसमें एक निम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक को दिखाने के विचार से इस इंस्टालेशन का निर्माण शैलेश ने किया था।


शैलेश पंडित को आल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट सोसाइटी नई दिल्ली की राष्ट्रीय पुरस्कार 2016 में सेसेरामिक में मिला। जिसका शीर्षक ” डमरू ऑन ग्लोब” था। जिसमे माध्यम के रूप में सेरामिक और स्टील का इस्तेमाल किया गया।
शैलेश पंडित काफी बड़े बड़े पॉट्स का निर्माण करते हैं और अलग अलग टेक्सचर के साथ प्रयोग भी करते हैं। इसके लिए तमाम रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल भी करते हैं जिसके कारण बर्तनों पर अलग और सुंदर इफेक्ट आते हैं जो कलाप्रेमियों को आकर्षित करने में सहायक होते हैं। शैलेश के विचार- सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए हैं। जो इनके काम मे दिखते हैं।
टेक्निकली तौर पर शैलेश प्रयोगशील व्यक्ति हैं। ग्लेज सेरामिक में केमिस्ट्री है। ब्लू ग्लेज( कॉपर , कोबाल्ट कार्बोनेट), ब्रॉन्ज गोल्ड के लिए कॉपर ऑक्साइड, इसमें बहुत सारे तरीके है जो तापमान पर भी निर्भर करते हैं साथ हमारी स्किल भी महत्वपूर्ण है।

शैलेश बी पंडित का जन्म 1982 में सिरेमिक कलाकार परिवार में हुआ। वे मृद्भांड, मूर्तिकला और मृत्तिका स्थापना में माहिर हैं। इनके दादा एक पारंपरिक कुम्हार थे और इनके पिता ( पद्मश्री बी आर पंडित ) एक स्टूडियो कुम्हार हैं जिन्हें 2013 में सेरामिक आर्ट में पद्मश्री और । स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने विज्ञान धारा को कालेज के विषय के रूप में चुना जिससे उन्हें मृत्तिका में ग्लेज़ की रसायन-शास्त्र को समझने में सहायता मिली। पांडिचेरी में रेमीकर और डेबोरा स्मिथ के तहत “गोल्डन ब्रिज मिट्टी के बर्तनों” के बारे में जानने के अलावा पांडिचेरी में उनके नाम का प्रदर्शन (बिना सूचना के बदलाव के) के लिए रेमीकर की सहायता के लिए उन्होंने सीमोरोजा आर्ट गैलरी, एम. एस. एस. में प्रदर्शन किया। विश्वविद्यालय, बिल्मत जीरमिक्स, यामिनी, नींबू और घास, जहांगीर कला दीर्घा और अखिल भारतीय ललित कला और शिल्प सोसायटी। नेहरू विज्ञान केंद्र, लालित्या फाउंडेशन तथा आल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट सोसाइटी नई दिल्ली द्वारा 2016 में पुरस्कार प्रदान किए गए हैं। सेंट एक्सवियर्स हाई स्कूल आदि जैसे स्कूलों में कार्यशाला और डेमोंस्ट्रेशन का आयोजन भी किया है। वर्तमान में मुम्बई स्थित मीरा भायंदर में अपने स्टूडियों में कार्य कर रहे हैं |

( लेखक एवं कलाकार भूपेंद्र के अस्थाना की कलम से)

बापू ने लखनऊ पे भी अपनी अनूठी छाप छोड़ दी जो आज भी कोई मिटा ना सका

Charbagh’s meeting spot where Nehru – Gandhi met for the first time

आज़ादी के परवानों के लिए स्वाधीनता संग्राम के समय बापू एक ऐसे महानायक बन चुके थे जिन्होंने अँग्रेज़ों को एक लाठी के दम पे धूल चटा दिया था । आज़ाद भारत के शूरवीरों में मोहनदास करमचंद गाँधी का नाम सुनहरे अक्षरों में आज भी दर्ज है । एक ऐसे समय जब बापू के जन्म के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, इस शहर का उनके साथ जो गहरा जुड़ाव है उसकी स्मृतियाँ आज भी शाने अवध अपने सीने में समेटे हुए है ।

देश और दुनिया को शांति, सहिष्णुता और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बापू ने ना केवल लखनऊ को आज़ादी की लड़ाई के परिपेक्ष में पहचान दी बल्कि, कुछ ऐसी यादें दे गये जो आज भी बापू की अमर गाथा शहर के बाशिंदों को बयान करती हैं।

1916 वो साल था  जब लखनऊ पॅक्ट की नीव शहर में रखी गयी। ये वो साल था जब INC और मुस्लिम लीग दोनो एक ही मंच पर साथ खड़े थे। कॉंग्रेस के इतिहास में ये वो वक़्त था जब कॉंग्रेस के मॉडरेट और एक्सट्रीमिस्ट गुटों ने वापस हाथ मिला लिया था।

पर दुनिया एक अलग तरह का इतिहास बनते देख रहा था। ये वो समय था जब देश के दो स्तंभ माने जाने वाले गाँधी और नेहरू पहली बार मिलने वाले थे।

वो एक मुलाकात, 26 दिसंबर 1916 को चारबाघ के रेलवे स्टेशन में इतिहास के पन्नों में एक अतरंगी दोस्ती बन गयी और देश को इसी जोड़ी ने आज़ादी का सुनेहरा सवेरा दिखाया।

वो बात अलग है की वो जगह जहाँ दोनो पहली बार मिले  कई सालों तक जंगल बना रहा। फिर कुछ समाज में जागरूक लोगों ने मिलके उस जगह को जहाँ नेहरू और गाँधी मिले उसे एक नया जीवन दान दिया परंतु  पार्किंग में दबे होने की वजह से उसे ज़्यादा लोग पहचान नही सकते। यहाँ तक की उसका इतिहास आज भी कई लोगों के लिए पहेली बना हुआ है।

गाँधी अहमदाबाद से चले थे लखनऊ के लिए। वोहीं नेहरू अलाहाबाद से लखनऊ की ओर कूच किए थे। इकॉनोमिक्स और सिद्धांतों पर एक वक्तव्य मूर कॉलेज में देने के बाद गाँधी, एक पब्लिक मीटिंग करके लखनऊ आए। दिसंबर 26 और 27 को वो कॉंग्रेस के सेशन्स का हिस्सा बने।

गाँधी और नेहरू ने साथ काम भी किया दोनो दोस्त थे, संग्रामी थे, देश के नेता के रूप में भी उभरे और कभी कभी एक दूसरे की बात से इत्तेफ़ाक़ नही रखते थे पर लक्ष्य एक सुनहरे भारत का ही था।

दोनों ने अपने अपने स्तर पर ऊँची उड़ान भरी। नेहरू देश के प्रधान मंत्री बने, वोहीं गाँधी जिन्हें साबरमती के संत भी कहा जाता है वो राष्ट्रपिता के उपाधि से सम्मानित किए गये। एक ओर जहाँ देश में लोगों को गाँधी ने रंग भेद से लड़ने का हौसला दिया तो वोहीं राजनीति से हटके देशहित की बात करने का भी फलसफा सिखाया। चंपारण में भी उनके द्रण  निश्चय की छाप हर एक को दिखी।

When two giants meet

इतिहास के पन्ने पलटने पे पता लगता है की 20 अक्टूबर 1920 को फिर से बापू अमीनाबाद पार्क आए। शहर वासियों को वो यहाँ आकर असहयोग आंदोलन की लॉ जलाए रखने की सलाह दे के गये। उन्होने महिलाओं को जो की मौलवीगंज  से यहाँ चहल कदमी करने आती थीं उनको संबोधित करते हुए उनको ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाया और फिर ये जगह आज़ादी के जंग के मंथन के लिए इस्तेमाल होने लगा। गाँधी ने अमीनाबाद में गूंगे नवाब बाघ में भी सभायें की, जहाँ उनके साथ मोहम्मद अली और शौकत अली थे।

वर्ष 1936 में गांधी जी 28 मार्च से 12 अप्रैल सबसे अधिक समय रहे और तमाम आयोजनों में शामिल होकर लोगों को अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने के लिए जागरुक किया था।

अमीनाबाद का गंगा प्रसाद हॉल भी आज़ादी की लड़ाई के सभाओं का प्रमुख केन्द्र था। बापू के ही कहने पर झंडे वाला पार्क अमीनाबाद में बनवाया गया था। बापू की याद में राज भवन से जिलाधिकारी के घर के बीच के रास्ते का 70 के दशक में नामकरण MG रोड पड़ गया।

माना जाता है बापू ने जंगे आज़ादी के समय महिलाओं को रोटी सेंकने से पहले चुटकी भर आटा दान करने को कहा स्वतंत्रता सेनानियों के लिए। इतना आटा आया की वो एक स्कूल में रखा गया, जिसे चुटकी भंडार स्कूल कहा जाने लगा।

लखनऊ के गोखले मार्ग में आज भी गाँधी की यादें एक बरगद के पेड़ के रूप में जीवित हैं, जिसे उन्होंने ही लगाया था।

यही नही गाँधी जब भी लखनऊ आए वो फरंगी महल में ठहेरते जो की सूफ़ी विद्वान मौलाना अब्दुल बारी का निवास स्थान था जिन्होंने खिलाफत मूव्मेंट में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। मौलाना अब्दुल बारी की आने वाली पीढ़ियों ने गाँधी के हर टेलिग्रॅम को संभाल के रखा। न केवल लखनऊ बल्कि देश भर में जब गाँधी को याद किया जा रहा है तो तहज़ीब और तलफ़्फ़ुज़ के शहर में  शायद ये बापू का ही  करिश्मा है की कभी भी कोई प्रदर्शन या क्रांति लानी हो तो आज भी GPO के पास गाँधी के प्रतिमा के चरणों में बैठके लोग लोहा गरम करते हैं। शायद इसी लिए देश आज भी कहता है – बन्दे में था दम।

जीवन की आपाधापी में कभी सिंधुताई जैसा बन के देखिएगा अच्छा लगेगा….

Sindhutai, an angel in disguise

अमिताभ बच्चन के करमवीर एपिसोड में, सिंधुताई आईं उन्होने खेला भी, पर दुनिया उनको KBC के लिए नही, बल्कि उनके निस्वार्थ भाओ से काम करने के वजह से याद रखेगा.

कभी घर से बहार निकाल दी गयी सिंधुताई ने जीवन में हर दुख भोगे. उन्होने शमशान के सूनी ज़मीन पर रात बिताई. उन्होने गली गली भीख माँगा. उन्होने ट्रेन पे  गाना भी गाया जिससे उन्हे दो जून की रोटी मिल सके. पर असल ज़िंदगी में उनका मक़सद बेसहारा बच्चों को सहारा देना था.

तक़रीबन 1400 बच्चों की माँ के रूप में सिंधुताई ने ना केवल एक कीर्तिमान स्थापित किया बल्कि उन्होंने दुनिया को दिखा दिया की जिसका कोई नही उसका सिंधुताई है. कई पुरस्कार और सम्मान के मिलने के बाद आज भी उनकी सौम्यता पल भर के लिए ओझल नही होती है.

ये उन्ही का करिश्मा है की सिंधुताई सपकाल के आते ही बच्चन ने उनके पैर छू लिए. बच्चन खुद भी ताई को एक पुरस्कार दे चुके हैं. तमाम तक़लीफ़ और चुनौतियों के बावजूद सिंधुताई ने ज़माने को ये दिखा दिया की कैसे अगर चाह है तो आप दूसरों की ज़िंदगी बदलने में कोई मुश्किल महसूस नहीं करोगे.

उनकी ज़िंदगी से जंग तब शुरू हुई जब वो महेज़ 20 साल की थीं. एक 10 दिन की बेटी को गोद में लेके वो जो वो घर से चली तो उनके कदम कभी घर की ओर वापस नही मुड़े. बहुत साल बाद जब सिंधुताई के पास उनके पति एक रहने के जगह लेने के लिए आए तो उन्होने भी झट से बोला – रहना है तो बेटा बन के रहो, पति नही.

कभी अपने ससुराल से धक्के मार के बाहर निकाली गयी सिंधुताई आज कई लोगो के लिए ना केवल प्रेरणास्रोत हैं, बल्कि कई बेसहारा बच्चों का भविष्य बदलने में सक्षम रही हैं. उन्होने खुद भीक माँगा क्यूंकी वो समाज के कुछ लोगों को खुशहाल देखना चाहती थीं.

जब खाने को नही था तो उन्हे लगा की ये दौर दूसरे ना देखें इसके लिए कोई कारगर कदम उठाने होंगे. यहाँ से शुरू हुआ उनका समाज सेवा का काम. जब भी उनके पास खाना अच्छी मात्रा में होता तो वो, अनात बच्चों को वो खाना मुहैया करातीं. जिससे कोई भी ग़रीब भूखा ना सोए.

अनाथ बच्चों को इतना बढ़िया सहारा देने का कार्य उन्होंने किया की एक समय आया जब उन्हे अनाथ बच्चों की माँ का दर्जा दे दिया गया. उस उपाधि को सिंधुताई आज भी अपने सर का ताज मानती हैं.

अब उन्होंने इतना ज़रूर कर दिया है की अनाथ बच्चे उनकी छत्र छाया में रह सकते हैं. उनका स्नेह और मार्गदर्शन बच्चों को भरपूर मिलता है. ज़िंदगी ने ऐसी करवट ली की एक ओर जहाँ परिवार का साथ छूटा, तो दूसरी ओर उनको 207 जमाई, 36 बहुएँ और 450 नाती पोते मिले. वो अकेले ही 1400 बच्चों की माँ हैं.

कई पुरस्कार और सम्मानों से नवाज़ी गयी सिंधुताई, ने देश के नाना प्रांतों में भ्रमर कर बच्चों को एक नया जीवन दान दिया है.

माँ जैसा प्यार और अच्छा साधन उनके छोटे छोटे प्रयासों के चलते बच्चों को नया जीवन दान मिल रहा है. बच्चों से उनका ऐसा लगाओ है की वो अब हर बच्चे का नाम कंठस्त कर चुकी हैं.

जो भी रकम सिंधुताई जीतीं वो उन्होने सन्मति बालनीकेतन चॅरिटी नामक संस्था को दान कर दिया. इससे ग़रीब बच्चों को भोजन, रहने को बसेरा और उनकी पढ़ाई का ख़याल रखेगा.

2017 में राष्ट्रपति के हाथों सिंधुताई को नारी शक्ति सम्मान से नवाज़ा गया. एक अनोखी माँ होने के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से 2013 में नवाज़ा गया. 2012 में उन्हे रियल हीरोस अवॉर्ड्स भी दिया CNN – IBN और रिलाइयन्स फाउंडेशन ने

2000 के बाद से KBC को 18 साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी ऐसे ऐसे लोग इस दरबार में आते हैं जिनके पास या तो ज्ञान का अनूठा भंडार है या फिर उन्होने ज़िंदगी किड धूप में तपके ज़माने में बदलाओ का सपना देखा. बच्चन की भाषा में ज्ञान ही आपको आपका हक़ दिला सकता है पर लोगों की हक़ की लड़ाई जो सिंधुताई ने शुरू की उसे देश के कोटि कोटि लोगों और ख़ास कर नवयुवकों को आगे ले के जाना होगा क्यूंकी कमज़ोर का सहारा बनना अपने आप में एक बड़ी बात है. इस बार KBC में रेजिस्ट्रेशन्स 31 मिलियन पार कर गये 15 दिनों में.

लखनऊ में मुट्ठीभर सब्ज़ी वालों ने उठाया संस्कृत को बचाने का ज़िम्मा

संस्कृत जगत में बदलाओ का सपना देखने वाले ये सब्ज़ीवाले हर दिन इस प्राचीन भाषा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

संस्कृत को पढ़ना और पढ़ाना आजकल  कहीं गुम सा हो गया है. देश में अँग्रेज़ी और हिन्दी ही जब सही से ना बोल पायें तो संस्कृत का धूमिल होना तो लाज़मी है बताते हैं निशातगंज के सब्ज़ी वाले, जिन्होने संस्कृत  को प्रचलित करने का बीड़ा उठाया है.

निशातगंज सब्ज़ी बज़ार में 50 से 60 सब्ज़ी वाले अपना दुकान चलाते हैं. उनमे से तीन से पाँच दुकानदार ऐसे हैं जिन्होने देश में पहली बार एक ऐसा प्रयोग किया है जो सराहनीय है.

निशातगंज का सब्ज़ी बज़ार देश का पहला ऐसा सब्ज़ी बज़ार बन गया है जहाँ सब्ज़ी संस्कृत में बेची जा रही है.

बिकरीकर्ता और खरीददार हर दिन की तरह उस दिन भी अपना दिन यहाँ बिता रहे थे, जब मैं यहाँ स्टोरी करने गया. सब्ज़ीवालों के लिए अब खबरों में रहना आम बात है.

सब्ज़ीवाले बताते हैं की आठ से नौ मीडीया संस्थानों के पत्रकार आके उनसे अक्सर सवाल जवाब कर के गये हैं. उनका कहना है की उन्हे अच्छा लगता है खबरों में बने रहना लेकिन, संस्कृत की खुश्बू दूर तक फैलाना उनका मूल लक्ष्य है.

सन 60 से, अशोक और उनके कई साथी यहाँ पर अच्छा बिक्री कर रहे हैं. और लोग भी इनके पास बार बार आते हैं क्यूंकी अच्छी सब्ज़ी सही दाम पे उन्हें यहीं मिलती है.

कई वसंत यहाँ बिता चुके ये सब्ज़ी वाले हर दिन इसी उम्मीद से संस्कृत में बात करते हैं की संस्कृत को अपना पुराना सुनेहरा पहचान मिल सके और ज़माने के करवट लेते ही ये कहीं गुमनामी के कगार पे ना पहुँच जाए.

अशोक जैसे कई नौजवान संस्कृत को बढ़ावा देते हुए खुश हैं. उनके आँखों में एक अजीब चमक है इस प्राचीन भाषा को बोलते हुए. कई दुकानों में बोर्ड लगाया हुआ था, पर अब नही है क्यूंकी गर्मी में सब्ज़ी धोते वक़्त खराब हो जाते हैं. बज़ार में सब्ज़ी बेचते कुछ विक्रेता बताते हैं की एक शुक्ला जी थे जो आर्या कन्या विद्यालय से आए थे और उन्होने ही संस्कृत को बढ़ावा देने का ये अनूठा आइडिया दिया.

 वो कहते हैं की बाकी वहान के लोगों ने बीड़ा उठा या उस पर काम करने का.

अशोक और उनके जैसे कई लोगों के लिए मसला ये है की जब देश में लोग अँग्रेज़ी और हिन्दी ही नही बोल पाते हैं तो संस्कृत को कैसे बढ़ावा मिले.

निशातगंज में ही कार्यरत नंदू सोनकर कहते हैं, “हमारा काम है की हम संस्कृत को बढ़ावा दें. हम अगर असफल रहे तो हम क्या कर सकते हैं.”

लोग जो अक्सर यहाँ आते हैं खुश हैं की संस्कृत बोलचाल का ज़रिया है. कुछ खुश हैं, तो कुछ मानते हैं की अभी बहुत वक़्त लगेगा इस पर लोगों को रिझा पाना. पर लोगों में बोलने का ख़ासा उत्साह दिखा.

खबरों में ये जगह बना तो हुआ है, पर कुछ ऐसे भी हैं जो अभी भी इस सब से अछूते हैं. जहाँ कुछ लोगों ने पब्लिसिटी स्टंट कह के बात को झुटला दिया है, सिकंदर कुमार गुप्ता मानते हैं की हम मातृभाषा को पल पल मरते नही देख सकते है. जब कोई अच्छी संस्कृत बोलता तो हम भी उनको सब्ज़ी खरीद पे डिसकाउंट देते हैं..”

गुजरात के वीरू सोनकर और उनका परिवार जो अपना काम यहाँ पर कर रहे हैं कहते हैं, “जैसे उर्दू, अँग्रेज़ी और हिन्दी ज़रूरी है, वैसे ही संस्कृत भी जानना अनिवार्या है, एक भारतीय के लिए. हमारे इस मुहीम का मक़सद है की हम कुछ करें जिससे इंसान यहाँ से लौट कर घर पे दो शब्द संस्कृत के भी बोले. लोगों में उत्साह है, पर सीखने की चाह नही.”

निशातगंज सब्ज़ी बज़ार अकेले एक ऐसा बेज़ार है जहाँ संस्कृत को बढ़ावा मिल रहा है. यहाँ पर आलू को आलूकं, टमाटर को रखतपलम, करेला को कर्वेलह, गाजर को गूंजनक्कम, लहसुन को लशुनाम. प्याज़ को पलांदूह , आद्रक को आद्राकम और मिर्ची को मिर्चिकं कहा जाता है.

पर पूरी बात को संक्षिप्त में कहते हुए, एक सज्जन, सटीक बात करते हैं. वो कहते हैं अगर हम जैसे अनपढ़ लोग संस्कृत समझ सकते हैं, तो समाज का पढ़ा लिखा वर्ग क्यूँ नही? हम कभी बी किसी पे थोप्ते नही इस भाषा को.

देश में एक राष्ट्र भाषा पे बहेस तब छिड़ गयी जब NCST ने संस्कृत को राष्ट्र भाषा बनाने की गुहार लगाई थी.